अतिथि सहायक प्राध्यापकों का सेवा स्थायीकरण : बिहार की उच्च शिक्षा की स्थिरता के लिए अनिवार्य

दरभंगा,(डॉ संजय कुमार सहनी);_किसी इमारत की मजबूती उसकी नींव में होती है, न कि उसकी बाहरी सजावट में। बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था के साथ ठीक यही विडंबना है — इमारत खड़ी है, कक्षाएं चल रही हैं, डिग्रियां बंट रही हैं, लेकिन जिस नींव पर यह पूरा ढांचा टिका है, वह खुद हर पल हिलने के डर में जी रही है। यह नींव हैं राज्य के विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में विगत कई वर्षों से कार्यरत लगभग 2000 से 2500 अतिथि सहायक प्राध्यापक — वे शिक्षक जिनके बगैर आज बिहार के अधिकांश महाविद्यालयों में एक भी कक्षा नहीं चल सकती, लेकिन जिनकी अपनी नौकरी का कल क्या होगा, तय नहीं है।
जब योग्यता और बहाली की प्रक्रिया एक हो, तो यह भेद कैसा? यह ऐसा प्रश्न है, जिसका जवाब बिहार सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन के पास आज तक नहीं है। नियमित सहायक प्राध्यापक और अतिथि सहायक प्राध्यापक — दोनों की न्यूनतम योग्यता एक ही मानक से तय होती है: यूजीसी रेगुलेशन 2018। दोनों की बहाली प्रक्रिया भी इसी नियमावली के अंतर्गत, नेट/सेट/पीएचडी जैसी अर्हताओं और साक्षात्कार की प्रक्रिया से होकर गुजरती है। कक्षा में दोनों से पांच घंटे का बराबर शिक्षण कार्य लिया जाता है — न एक मिनट कम, न ज्यादा। पाठ्यक्रम वही, परीक्षा की जिम्मेदारी वही, मूल्यांकन का दायित्व वही, यहां तक कि शोधार्थियों के मार्गदर्शन का भार भी अक्सर बराबर।
फिर सवाल यह उठता है — जब योग्यता एक है, चयन प्रक्रिया एक है, कार्यभार एक है, तो वेतन, सम्मान और सेवा सुरक्षा में यह ज़मीन-आसमान का अंतर क्यों? यदि यूजीसी रेगुलेशन 2018 यह मानता है कि दोनों प्रकार के शिक्षक समान योग्यता रखते हैं, तो राज्य सरकार किस आधार पर एक को “स्थायी वर्ग” और दूसरे को “अस्थायी वर्ग” में बांटती चली आ रही है? यह भेद योग्यता का नहीं, नीयत का प्रश्न है।
तत्काल काम चलाओ प्रणाली की जो अवधारणा कभी अपवाद के रूप में शुरू हुई थी, बिहार में वह अब व्यवस्था का स्थायी चरित्र बन चुकी है। एक ही विभाग में, एक ही समय-सारणी पर, एक जैसी योग्यता और एक जैसा परिश्रम रखने वाले दो शिक्षकों के बीच वेतन का अंतर कई गुना तक पहुंच जाता है। नियमित शिक्षक को वेतनमान, पेंशन, चिकित्सा सुविधा, पदोन्नति और सेवा सुरक्षा मिलती है; अतिथि शिक्षक को एक निश्चित मानदेय के अलावा प्रायः कुछ नहीं मिलता है, न भविष्य निधि, न स्वास्थ्य बीमा, न सेवा निरंतरता की कोई गारंटी। यह असमानता किसी दुर्घटना से नहीं, बल्कि जानबूझकर बनाए रखी गई एक ऐसी व्यवस्था से उपजी है जो समान योग्यता और समान श्रम के बावजूद सस्ते श्रम पर टिकी शिक्षा व्यवस्था चलाना चाहती है।
इसे केवल आर्थिक असमानता कहकर छोड़ देना भी अन्याय होगा। हर सत्र के अंत में अनुबंध नवीनीकरण की अनिश्चितता, हर वर्ष नए सिरे से “योग्यता सिद्ध” करने का दबाव, और बिना किसी स्पष्ट सेवा नियम के दस-दस, पंद्रह-पंद्रह वर्षों तक काम करते रहने की बाध्यता — यह सब मिलकर एक ऐसा तंत्र रचते हैं, जिसे व्यवस्था का “सामान्य नियम” बना दिया गया है। जो शिक्षक यूजीसी की उसी कसौटी पर खरा उतरकर नियुक्त हुआ, उसी को वर्षों बाद भी “अतिथि” कहकर संबोधित करना, उसकी अकादमिक पहचान और आत्मसम्मान दोनों पर आघात है।
इस अस्थिरता की कीमत केवल जेब से नहीं चुकानी पड़ती, मन और समाज दोनों स्तर पर चुकानी पड़ती है। जो शिक्षक हर वर्ष यह नहीं जानता कि अगले सत्र में उसका नवीनीकरण होगा या नहीं, वह एक स्थायी मानसिक तनाव में जीता है — यह तनाव कक्षा के बाहर भी उसका पीछा नहीं छोड़ता। बिहार के इन 2000 से अधिक शिक्षकों में से अधिकांश ऐसे हैं जिन्होंने अपने जीवन के सर्वश्रेष्ठ वर्ष — जब करियर स्थिर होना चाहिए, परिवार बसना चाहिए, बच्चों की शिक्षा की योजना बननी चाहिए — इसी अनिश्चितता में गुजार दिए। कई शिक्षक इसी प्रतीक्षा में विवाह योग्य आयु पार कर गए, कई घर और परिवार की जिम्मेदारियां पूरी करने में असमर्थ रहे, क्योंकि आय अनियमित और भविष्य अनिश्चित है।
समाज में भी इस अनिश्चितता की अपनी कीमत है। “प्रोफेसर साहब” कहलाने वाला व्यक्ति मन ही मन भीतर से जानता है कि उसकी नौकरी किसी प्रशासनिक आदेश का मोहताज है, तो सम्मान और असुरक्षा के बीच का यह द्वंद्व उसे भीतर से आत्मीय स्तर पर खोखला करता जाता है। यह प्रताड़ना दिखाई नहीं देती, किसी रजिस्टर में दर्ज नहीं होती, लेकिन यह उतनी ही वास्तविक है जितनी कोई आर्थिक तंगी।
यह सोचना भूल है कि ये अतिथि शिक्षक केवल एक अस्थायी कमी को भरने वाला विकल्प भर हैं। वास्तविकता यह है कि इन्हीं 2000 से 2500 शिक्षकों के हाथों बीते वर्षों में बिहार के लाखों विद्यार्थी तैयार हुए, शोधार्थियों ने मार्गदर्शन पाया, विभागों ने अपनी शैक्षणिक साख बचाई। यह कोई एहसान नहीं, बल्कि एक ऐसी अकादमिक पूंजी है जिसे राज्य ने बिना उचित निवेश के वर्षों तक इस्तेमाल किया है। जब कोई शिक्षक यूजीसी की एक समान अर्हता के साथ, समान पांच घंटे के परिश्रम से वर्षों तक किसी संस्थान को अपनी योग्यता, समय और मानसिक स्थिरता समर्पित करता है, तो उस योगदान का मूल्यांकन “अस्थायी मानदेय” से कहीं आगे जाकर होना चाहिए।
जब इसके समाधान की ओर बढ़ते हैं तो एहसास होता है कि यह नीति की असली परीक्षा है। योग्यता आधारित नियमित नियुक्ति प्रक्रिया चलनी ही चाहिए — इसमें कोई समझौता नहीं होना चाहिए। लेकिन जब बहाली की कसौटी ही यूजीसी रेगुलेशन 2018 है और कार्यभार भी समान है, तो बिहार सरकार को एक स्पष्ट नीति बनानी चाहिए जिसमें इन वर्षों से सेवारत शिक्षकों के अनुभव, शोध कार्य और शिक्षण अवधि के आधार पर सेवा नियमितीकरण का लाभ मिले। यह किसी विशेष कृपा की मांग नहीं, बल्कि उसी योग्यता का सम्मान करने की मांग है, जिसके आधार पर इन्हें वर्षों पहले चयनित किया गया था।
अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि नियमित नियुक्तियों के लिए संसाधन और प्रक्रिया समय लेती है। यह आंशिक रूप से सही भी है। लेकिन जब यही “समय” वर्षों में बदल जाए, और उस दौरान वही टाला हुआ ढांचा बिहार की पूरी उच्च शिक्षा को ढोता रहे, तो यह संसाधन की समस्या कम, नीयत की कमी ज्यादा लगती है। जिस व्यवस्था को जानबूझकर लंबा खींचा जाता है ताकि समान योग्य और समान श्रम करने वाले शिक्षकों से सस्ते श्रम का लाभ मिलता रहे, उसे “अस्थायी प्रबंध” कहना उस अन्याय को छुपाने का एक सुविधाजनक बहाना भर है।
बिहार की उच्च शिक्षा तभी सच्चे अर्थों में मजबूत होगी, जब वह अपनी नींव को पहचानेगी और उसे वह सम्मान देगी जिसकी वह हकदार है। जब योग्यता एक है, प्रक्रिया एक है, कार्यभार एक है, तो सम्मान और सुरक्षा में भेद निश्चित ही व्यवस्थागत दोष है। यह केवल इन 2000 से 2500 अतिथि सहायक प्राध्यापकों के भविष्य का सवाल नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को मिलने वाली शिक्षा की गुणवत्ता और एक न्यायसंगत समाज के निर्माण का सवाल है। जब तक कक्षा में पढ़ाने वाला हाथ खुद आर्थिक असुरक्षा और मानसिक तनाव से कांपता रहेगा, तब तक विद्यार्थी को मिलने वाला ज्ञान भी अधूरा और अस्थिर ही रहेगा। स्थायी शिक्षा, अस्थायी और अनिश्चित हाथों पर ज्यादा दिन नहीं टिक सकती — इसलिए अतिथि सहायक प्राध्यापकों का सेवा नियमितीकरण अब कोई विकल्प नहीं, बिहार उच्च शिक्षा की स्थिरता के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता है — यह सच बिहार को जितनी जल्दी समझ आ जाए, उतना ही बेहतर।
डॉ संजय कुमार सहनी
Author: Sanjay Kumar Sahni








