
गांधी को समझने के लिए पहले स्वयं को बदलना होगा

दरभंगा_(डॉ संजय कुमार सहनी); गांधी जयंती एवं विश्व अहिंसा दिवस के अवसर पर शुक्रवार को मंडल कारा, दरभंगा में ‘हिन्द स्वराज की प्रासंगिकता’ विषय पर एक विचारपरक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में महात्मा गांधी के विचारों, विशेषकर हिन्द स्वराज में व्यक्त स्वराज, सत्य, अहिंसा, आत्मसंयम और नैतिक जीवन की अवधारणा को वर्तमान सामाजिक जीवन से जोड़ते हुए बंदियों के बीच संवाद स्थापित किया
कार्यक्रम का शुभारंभ गांधीजी के प्रिय भजन ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए’ से हुआ। इसके पश्चात मंगलाचरण और मंचासीन अतिथियों द्वारा दीप प्रज्ज्वलित कर संगोष्ठी का औपचारिक उद्घाटन किया गया। वातावरण में गांधी के विचारों और भजन की संवेदना ने कार्यक्रम को वैचारिक एवं आत्मिक गरिमा प्रदान की।
कार्यक्रम की अध्यक्षता मंडल कारा, दरभंगा की जेल अधीक्षक महोदया स्नेह लता ने की। उन्होंने गांधीजी के सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों को केवल ऐतिहासिक विरासत के रूप में देखने के बजाय जीवन-व्यवहार का हिस्सा बनाने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि मनुष्य के जीवन में परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, सत्य का रास्ता और अहिंसा का अनुशासन व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाता है। उन्होंने बंदियों से आग्रह किया कि वे अपने अतीत को जीवन का अंतिम सत्य न मानें, बल्कि आत्मचिंतन और सकारात्मक परिवर्तन के माध्यम से अपने वर्तमान को बेहतर बनाएं। उनके अनुसार, सुधार की वास्तविक शुरुआत तब होती है जब व्यक्ति अपने भीतर के संघर्ष को पहचानकर स्वयं को बदलने का प्रयास करता है।
कार्यक्रम के संयोजक अजीत कुमार मिश्र ने हिन्द स्वराज के मूल संदेश को व्यवहारिक जीवन से जोड़ते हुए कहा कि गांधी का स्वराज केवल राजनीतिक सत्ता प्राप्त करने की अवधारणा नहीं था। गांधी के लिए स्वराज का अर्थ था—अपने ऊपर अपना शासन। उन्होंने कहा कि यदि व्यक्ति अपनी इच्छाओं, वासनाओं, लोभ, क्रोध और हिंसा पर नियंत्रण नहीं रख सकता तो बाहरी स्वतंत्रता भी अधूरी मानी जाएगी। उन्होंने बंदियों से आग्रह किया कि हिन्द स्वराज को केवल पढ़ने की पुस्तक न मानकर आत्मपरिवर्तन की प्रेरणा के रूप में ग्रहण करें।

सी. एम. कॉलेज, दरभंगा के मनोविज्ञान विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. दिनेश प्रसाद साहू ने गांधीजी के जीवन-संघर्ष और उनके आत्मानुशासन पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने मनुष्य के मानसिक स्वास्थ्य, आत्मनियंत्रण और आंतरिक शांति के संदर्भ में योगाभ्यास की उपयोगिता समझाई तथा उपस्थित बंदियों को योग का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया।
उन्होंने कहा कि मनुष्य का सबसे कठिन संघर्ष बाहरी दुनिया से नहीं, अपने मन से होता है। उन्होंने इस दौरान योग अभ्यास कराया । उन्होंने कहा कि योग व्यक्ति को अपने भीतर देखने, विचारों को नियंत्रित करने और मानसिक अस्थिरता को संतुलित करने का अभ्यास देता है। उन्होंने आत्मा और परमात्मा के बीच संबंध की आध्यात्मिक व्याख्या करते हुए कहा कि आत्मिक शांति और मानसिक संयम के लिए व्यक्ति को अपने भीतर की अशांति को पहचानना और उसे साधना आवश्यक है। उनके अनुसार, गांधी का सत्याग्रह भी अंततः आत्मबल और आत्मसंयम की शक्ति पर आधारित था।
सब डिविजनल गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज, बेनीपुर, दरभंगा के इतिहास विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. संजय कुमार सहनी ने हिन्द स्वराज की ऐतिहासिकता और वर्तमान समय में उसकी प्रासंगिकता पर विस्तार से विचार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि 1909 में लिखे गए हिन्द स्वराज को केवल औपनिवेशिक शासन की आलोचना करने वाली पुस्तक के रूप में पढ़ना गांधी के विचार की सीमा तय कर देना होगा। इसके भीतर आधुनिक सभ्यता, अंध उपभोग, नैतिक पतन, हिंसा, इच्छाओं की अनियंत्रित वृद्धि और मनुष्य के अपने ऊपर से नियंत्रण खोने को लेकर गांधी की गहरी चिंता दिखाई देती है।
डॉ. सहनी ने विशेष रूप से गांधी के ‘स्वराज’ की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा कि गांधी के लिए स्वराज का वास्तविक अर्थ केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं था। स्वराज का पहला और सबसे महत्वपूर्ण अर्थ है—आत्मशासन और आत्मानुशासन। उन्होंने कहा कि यदि व्यक्ति लोभ पर नियंत्रण नहीं रख सकता, क्रोध को नियंत्रित नहीं कर सकता, हिंसा से स्वयं को अलग नहीं कर सकता, चोरी से दूर नहीं रह सकता और झूठ को अपने जीवन का साधन बना लेता है, तो केवल राजनीतिक स्वतंत्रता उसे वास्तविक अर्थों में स्वराज नहीं दे सकती।
उन्होंने कहा कि “अपने मन पर शासन करना ही स्वराज की पहली सीढ़ी है।” व्यक्ति जब अपने भीतर के लोभ, क्रोध, अहंकार, हिंसा और असत्य पर नियंत्रण स्थापित करता है, तभी वह अपने जीवन का वास्तविक शासक बनता है। इस अर्थ में हिन्द स्वराज आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, क्योंकि आधुनिक समाज में तकनीकी और भौतिक प्रगति के बावजूद मनुष्य के सामने आत्मसंयम, तनाव, क्रोध, उपभोग की बढ़ती इच्छा और सामाजिक हिंसा जैसी चुनौतियां मौजूद हैं।
डॉ. सहनी ने कहा कि जेल को केवल दंड की जगह के रूप में नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और सुधार के अवसर के रूप में भी देखा जाना चाहिए। गांधी के विचार इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने बंदियों से कहा कि अतीत की भूलें भविष्य को अनिवार्य रूप से निर्धारित नहीं करतीं। व्यक्ति अपने विचार, व्यवहार और निर्णय बदलकर अपने जीवन की दिशा बदल सकता है। उन्होंने कहा कि गांधी का अहिंसा का संदेश केवल दूसरों को चोट न पहुंचाने तक सीमित नहीं है; यह अपने भीतर की हिंसक प्रवृत्तियों को पहचानने और उन्हें नियंत्रित करने का भी अभ्यास है।
कार्यक्रम में रामशंकर जी (परामर्शी) ने गांधी के हिन्द स्वराज को आत्मिक, मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति के संदर्भ में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि मनुष्य का विकास केवल भौतिक सुविधाओं की वृद्धि से नहीं होता। वास्तविक विकास तब है जब व्यक्ति अपने विचारों, भावनाओं और आचरण को परिष्कृत करता है। उन्होंने कहा कि गांधी का स्वराज मनुष्य को भीतर से स्वतंत्र बनाने का प्रयास है—ऐसी स्वतंत्रता जिसमें व्यक्ति अपनी कमजोरियों और नकारात्मक प्रवृत्तियों का दास न रहे।
शिक्षक डॉ राजेश रमन जी ने क्रोध को व्यक्ति और समाज दोनों के लिए विनाशकारी बताते हुए उसके नियंत्रण के व्यावहारिक उपायों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि क्रोध के क्षण में लिया गया निर्णय कई बार पूरे जीवन को प्रभावित कर सकता है। गांधी का रास्ता व्यक्ति को प्रतिक्रिया के स्थान पर आत्मनियंत्रण, संवाद और विवेक की ओर ले जाता है। उन्होंने बंदियों से आग्रह किया कि वे अपने जीवन में गांधी के सत्य, अहिंसा और संयम के सिद्धांतों को अपनाकर सकारात्मक परिवर्तन की शुरुआत करें।
वक्ताओं ने इस बात पर विशेष बल दिया कि आज जब मनुष्य तकनीकी रूप से अधिक सक्षम लेकिन मानसिक रूप से अनेक प्रकार के तनाव, असंतोष और आक्रोश से घिरा हुआ है, तब गांधी का आत्मसंयम, सीमित उपभोग, नैतिकता, सत्य और अहिंसा का विचार व्यक्ति तथा समाज दोनों के लिए महत्वपूर्ण चिंतन का आधार बन सकता है।
कार्यक्रम के अंत में उपाधीक्षक महोदय सुनील कुमार ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए सभी अतिथियों, अधिकारियों, आयोजकों और बंदियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रम कारागार में सकारात्मक वातावरण बनाने के साथ-साथ बंदियों को आत्मचिंतन और सामाजिक पुनर्स्थापन की दिशा में प्रेरित करते हैं।
कार्यक्रम का समापन बंदियों द्वारा प्रस्तुत राम भजन से हुआ। पूरे कार्यक्रम में गांधीजी के विचारों का केंद्रीय संदेश यही रहा कि स्वराज बाहर की सत्ता पर अधिकार करने से पहले स्वयं पर अधिकार करने का नाम है और अहिंसा केवल हथियार छोड़ना नहीं, बल्कि मन, वचन और कर्म में हिंसा पर नियंत्रण स्थापित करना है। मंच संचालन जेल उपाधीक्षक महोदया पूनम ने किया।
गांधी जयंती के अवसर पर मंडल कारा दरभंगा में आयोजित यह संगोष्ठी इस संदेश के साथ संपन्न हुई कि मनुष्य को बदलने की शुरुआत समाज से नहीं, स्वयं से करनी होगी और यही ‘हिन्द स्वराज’ की सबसे जीवंत प्रासंगिकता है।
Author: Sanjay Kumar Sahni












