दरभंगा_(डॉ संजय कुमार सहनी), जन उदासीनता जनप्रतिनिधियों की चुप्पी और अतिक्रमण के बीच संकट में ऐतिहासिक जलधरोहर। बहादुरपुर प्रखंड मुख्यालय स्थित पंचायत भवन एवं कर्पूरी आश्रम के पीछे से लेकर ब्लॉक रोड के पूर्वी भाग में लगभग चार बीघा क्षेत्रफल में फैला एक ऐतिहासिक सरकारी तालाब, जिसे स्थानीय स्तर पर “धोबिया पोखर” के नाम से जाना जाता है, वर्तमान में गंभीर अतिक्रमण, अवैध निर्माण एवं प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार है।

उक्त तालाब भूखंड का थाना संख्या – 236 नया, 342 पुराना, खेसरा 137/1063,1064 है, जो आम गैरमजरूआ परती कादिम भूमि है। बहादुरपुर।
उक्त तालाब दशकों से स्थानीय जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण तथा पर्यावरणीय संतुलन का महत्वपूर्ण स्रोत रहा है। किंतु विगत लगभग पंद्रह वर्षों से तालाब की समुचित सफाई, गाद निकासी एवं संरक्षण नहीं होने के कारण यह जलकुंभी एवं गाद से भरकर मृतप्राय स्थिति में पहुंच गया है। इस परिस्थिति का लाभ उठाते हुए कुछ व्यक्तियों द्वारा तालाब एवं उससे संबंधित सरकारी भूमि पर मिट्टी भरकर अवैध पक्के निर्माण एवं निजी कब्जे किए जा रहे हैं, जिससे तालाब का वास्तविक क्षेत्रफल निरंतर घटता जा रहा है।
यह मामला केवल सरकारी भूमि पर अतिक्रमण का नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, जल सुरक्षा, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा तथा भावी पीढ़ियों के हितों से जुड़ा अत्यंत गंभीर विषय है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय, राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) तथा विभिन्न सरकारी निर्देशों में सार्वजनिक जलाशयों एवं तालाबों को अतिक्रमण से मुक्त रखने तथा उनके संरक्षण को राज्य का दायित्व माना गया है।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या हमारी प्रशासनिक व्यवस्था अपने पारंपरिक जलस्रोतों को बचाने के प्रति वास्तव में गंभीर है?
ऐसा इसीलिए कहा जा रहा है क्योंकि 12 जून 2026 को इस पोखर की बदहाल स्थिति, जलकुंभी और गाद से भरते जलक्षेत्र तथा बढ़ते अतिक्रमण को लेकर दैनिक भास्कर में खबर प्रकाशित होने के बाद भी यदि स्थिति में अपेक्षित बदलाव नहीं आता है, तो यह केवल एक जलस्रोत की उपेक्षा नहीं, बल्कि जल संरक्षण, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी सामूहिक जिम्मेदारी की परीक्षा है।
लगभग चार बीघा से अधिक क्षेत्र में फैला यह पारंपरिक जलस्रोत वर्षों की उपेक्षा, जलकुंभी, गाद, जलनिकासी की समस्या और अतिक्रमण के दबाव से लगातार सिकुड़ता जा रहा है। जून 2026 में प्रकाशित रिपोर्ट में भी स्थानीय लोगों द्वारा इसके अस्तित्व पर संकट और प्रशासनिक कार्रवाई की आवश्यकता उठाई गई थी।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब किसी सार्वजनिक जलस्रोत की स्थिति लंबे समय से खराब हो, उसकी जमीन के संबंध में शिकायतें सामने आती रहें और स्थानीय लोग बार-बार आवाज उठाते रहें, तब संबंधित विभागों की जिम्मेदारी आखिर कहां से शुरू होती है और कहां समाप्त होती है?
तालाब केवल पानी जमा करने की जगह नहीं होता। वह भूजल पुनर्भरण का माध्यम है, वर्षा के पानी को रोकने वाला प्राकृतिक ढांचा है, स्थानीय पारिस्थितिकी का आधार है और बाढ़ तथा जलजमाव के प्रभाव को कम करने वाली पारंपरिक व्यवस्था का हिस्सा है। किसी पोखर के जलग्रहण या जलभरण क्षेत्र में मिट्टी भरना, निर्माण करना अथवा प्राकृतिक जलप्रवाह को बाधित करना केवल जमीन के स्वरूप में परिवर्तन का नहीं है; इसका प्रभाव पूरे स्थानीय जल-चक्र पर पड़ता है।
आज जब जल संकट देश और दुनिया के सामने गंभीर चुनौती बन चुका है, उस समय पारंपरिक जलस्रोतों को बचाने के बजाय उनका सिकुड़ना विशेष चिंता का विषय है। एक ओर सरकार जल संरक्षण की योजनाओं पर सार्वजनिक धन खर्च करती है, दूसरी ओर यदि मौजूद जलस्रोत ही धीरे-धीरे खत्म होते रहें तो योजनाओं की वास्तविक प्रभावशीलता पर सवाल उठना भी स्वाभाविक है।
धोबिया पोखर का प्रश्न इसी विरोधाभास को सामने रखता है। अतिक्रमण केवल जमीन का नहीं, भविष्य के पानी का सवाल है
किसी तालाब की वास्तविक सीमा केवल आज दिखाई देने वाले पानी से तय नहीं होती। उसका जलग्रहण क्षेत्र, प्राकृतिक जलप्रवाह, जलनिकासी मार्ग और आसपास का क्षेत्र भी उसके अस्तित्व से जुड़े होते हैं। यदि इन क्षेत्रों पर अतिक्रमण होता है या मिट्टी भरकर उनका स्वरूप बदल दिया जाता है तो आने वाले समय में तालाब का प्राकृतिक जलसंचयन प्रभावित हो सकता है।
इसलिए केवल तालाब में मौजूद जलकुंभी हटाना पर्याप्त नहीं होगा। तालाब का सीमांकन, अभिलेखीय स्थिति का सत्यापन, जलभरण क्षेत्र की पहचान, प्राकृतिक जलप्रवाह की बहाली और कथित अतिक्रमण की निष्पक्ष जांच—इन सभी पहलुओं पर एक साथ कार्रवाई आवश्यक है।
12 जून की रिपोर्ट के बाद सामने आई स्थिति ने स्थानीय लोगों की चिंता को और गंभीर बनाया है। जून में प्रकाशित रिपोर्ट में भी स्थानीय नागरिकों द्वारा प्रशासन से सरकारी अभिलेखों के आधार पर सीमांकन, अतिक्रमण हटाने और पुनर्जीवन अभियान की मांग की गई थी।
धोबिया पोखर जैसे जनसरोकार के विषय केवल प्रशासन के भरोसे नहीं छोड़े जा सकते। स्थानीय जनप्रतिनिधियों की भी जिम्मेदारी है कि वे क्षेत्र के जलस्रोतों की स्थिति को लेकर प्रशासन के समक्ष प्रभावी ढंग से आवाज उठाएं।
यदि आज एक ऐतिहासिक पोखर सिकुड़ रहा है और हम चुप हैं, तो कल जब क्षेत्र में जल संकट बढ़ेगा, भूजल स्तर प्रभावित होगा या जलजमाव की समस्या गंभीर होगी, तब उसकी जिम्मेदारी केवल प्रकृति पर नहीं डाली जा सकती।
इस मुद्दे पर प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही जितनी आवश्यक है, उतनी ही स्थानीय समाज की भागीदारी भी जरूरी है। सार्वजनिक जलस्रोतों की रक्षा केवल सरकारी योजना से नहीं हो सकती। स्थानीय नागरिकों, सामाजिक संगठनों, शिक्षकों, विद्यार्थियों और पर्यावरण से जुड़े लोगों को भी निगरानी और संरक्षण की प्रक्रिया से जोड़ा जाना चाहिए। लेकिन जनता की भागीदारी तभी सार्थक होगी, जब शिकायतों को गंभीरता से सुना जाए और शिकायतकर्ता को यह भरोसा हो कि उसकी आवाज प्रशासनिक प्रक्रिया में परिणाम तक पहुंचेगी।
धोबिया पोखर के मामले में अब जरूरत है कि – सरकारी अभिलेखों के आधार पर पोखर का पूर्ण सीमांकन कराया जाए। पूरे जलक्षेत्र और जलभरण क्षेत्र का भौतिक सत्यापन कराया जाए। तालाब के चारों ओर बढ़ रहे अतिक्रमण और अवैध निर्माण की निष्पक्ष जांच हो। अतिक्रमण प्रमाणित होने पर नियमानुसार कार्रवाई की जाए।जलकुंभी और गाद की वैज्ञानिक तरीके से सफाई कराई जाए। पोखर तक आने वाले प्राकृतिक जलप्रवाह और निकासी मार्गों को चिह्नित कर संरक्षित किया जाए। पोखर के चारों ओर भविष्य के अतिक्रमण को रोकने के लिए स्थायी निगरानी व्यवस्था तथा पोखर का भिड़ा बांध दिया जाए। पुनर्जीवन के बाद भी इसकी नियमित निगरानी के लिए स्थानीय नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
मिथिला की पहचान उसके तालाबों, पोखरों और पारंपरिक जलसंरचनाओं से रही है। यदि हम विकास के नाम पर अपने जलस्रोत खोते जाएंगे, तो आने वाली पीढ़ियों को केवल इतिहास की किताबों में यह बताने से कोई लाभ नहीं होगा कि कभी हमारे गांवों और कस्बों में बड़े-बड़े पोखर हुआ करते थे।
धोबिया पोखर आज एक चेतावनी है।
यदि अभी भी विभागीय उदासीनता, जनप्रतिनिधियों की चुप्पी और सामाजिक निष्क्रियता जारी रही, तो कल यह पोखर केवल नक्शे और सरकारी अभिलेखों में रह सकता है। और तब सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि पोखर किसने अतिक्रमित किया, बल्कि यह भी पूछा जाएगा कि जब जलस्रोत हमारे सामने खत्म हो रहा था, तब उसे बचाने की जिम्मेदारी रखने वाले लोग क्या कर रहे थे? धोबिया पोखर को बचाने का समय अभी है। जलस्रोत खत्म होने के बाद संरक्षण की घोषणाएं केवल औपचारिकता रह जाएंगी।
डॉ. संजय कुमार सहनी
Author: Sanjay Kumar Sahni











