आईआईटी बॉम्बे की घटना : परीक्षा से आगे, शिक्षा के अर्थ पर उठता सवाल।

 

बिहार:_ किसी प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान की पहचान केवल उसके उत्कृष्ट परीक्षा परिणामों, ऊँचे प्लेसमेंट पैकेज या प्रवेश परीक्षा की कठिन प्रतिस्पर्धा से नहीं होती। बल्कि किसी संस्थान की वास्तविक श्रेष्ठता की पहचान इस बात से तय होती है कि वह अपने विद्यार्थियों की सफलता के साथ उनकी असफलता, तनाव, भय और कमजोर क्षणों के साथ कैसा व्यवहार करता है।

 

आईआईटी बॉम्बे में छात्र साहिल रविंद्र वाकोडे की मृत्यु के बाद उठे सवाल भारतीय उच्च शिक्षा के उस व्यापक चरित्र पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं, जिसमें अंक, रैंक और प्रदर्शन को कभी-कभी जीवन के मानवीय पक्ष से अधिक महत्व दिया जाने लगता है। 18 सितंबर 2026 को आई आई टी बॉम्बे के द्वितीय वर्ष के छात्र साहिल वाकोडे की अपने छात्रावास में मृत्यु हुई। इससे पहले परीक्षा के दौरान उनके पास मोबाइल फोन होने और कथित रूप से चैट जी पी टी के इस्तेमाल से जुड़े घटनाक्रम की जानकारी सामने आई।

 

घटना के बाद छात्रों के विरोध-प्रदर्शन ने प्रश्नों का दायरा और बड़ा कर दिया। विद्यार्थियों ने संस्थान से अधिक पारदर्शिता, स्वतंत्र जांच, बेहतर शिकायत-निवारण व्यवस्था, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं और छात्र कल्याण से संबंधित कई मांगें रखीं। संस्थान ने बाद में कई मांगों पर कार्रवाई का आश्वासन दिया और प्रो. सूर्यनारायण दुल्ला को डीन के प्रशासनिक पद से हटा दिया।

 

मूल प्रश्न यह है कि हम अपने विद्यार्थियों से आखिर चाहते क्या हैं? क्या हम ऐसे युवा तैयार करना चाहते हैं जो कठिन प्रश्नों का उत्तर केवल परीक्षा में लिख सकें, या ऐसे नागरिक भी जो कठिन परिस्थितियों में सही निर्णय लेने का साहस रखते हों? नकल गलत है। परीक्षा में अनुचित साधनों का इस्तेमाल शैक्षणिक ईमानदारी के विरुद्ध है। किसी भी उच्च शिक्षण संस्थान में अकादमिक मानकों और परीक्षा की विश्वसनीयता की रक्षा आवश्यक है। यदि विद्यार्थी नकल को सामान्य व्यवहार मानने लगे तो डिग्री का मूल्य, परिश्रम का सम्मान और योग्यता की विश्वसनीयता—तीनों प्रभावित होंगे।

 

शिक्षा का उद्देश्य केवल गलती पकड़ना नहीं, गलती के कारण को समझना और विद्यार्थी को बेहतर विकल्प की ओर ले जाना भी है। यही वह जगह है जहाँ शिक्षक और संस्था की भूमिका परीक्षा-कक्ष से आगे बढ़ जाती है। एक विद्यार्थी परीक्षा में असफल हो सकता है। वह किसी विषय को समझ नहीं सकता। वह दबाव में गलत निर्णय ले सकता है। वह अपनी क्षमता से कम प्रदर्शन कर सकता है। लेकिन इन सबके बावजूद उसकी गरिमा और जीवन का मूल्य कम नहीं होना चाहिए।

 

आज भारतीय शिक्षा व्यवस्था के सामने यही सबसे गंभीर चुनौती है। एक ओर संस्थानों में प्रवेश पाने के लिए अभूतपूर्व प्रतिस्पर्धा है, दूसरी ओर प्रवेश के बाद विद्यार्थियों से लगातार उत्कृष्ट प्रदर्शन की अपेक्षा की जाती है। स्कूल से कोचिंग, कोचिंग से प्रतियोगी परीक्षा और प्रतियोगिता से उच्च शिक्षा तक की यात्रा में विद्यार्थी कई बार यह मानने लगता है कि उसकी पूरी पहचान उसके अंक और रैंक से निर्धारित होती है। यहीं शिक्षा और परीक्षा के बीच अंतर समझना जरूरी है। परीक्षा ज्ञान को माप सकती है; वह मनुष्य का संपूर्ण मूल्य नहीं माप सकती। अंक एवं रैंक विद्यार्थी की परीक्षा-स्थिति बता सकता है; वह उसकी पूरी प्रतिभा, रचनात्मकता, संवेदना, संघर्ष और संभावनाओं को नहीं बता सकता है।

 

आईआईटी जैसे संस्थानों में प्रवेश पाने वाले विद्यार्थी निश्चित रूप से अत्यंत प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया से गुजरते हैं। लेकिन प्रवेश के बाद भी हर विद्यार्थी की सामाजिक, आर्थिक, भाषायी, पारिवारिक और शैक्षणिक पृष्ठभूमि समान नहीं होती। इसलिए उच्च शिक्षा में समान मानक के साथ समान अवसर और आवश्यक शैक्षणिक-सामाजिक सहयोग भी जरूरी है। किसी विद्यार्थी से यह कहना कि उसे कठिन परीक्षा का सामना करना होगा—शिक्षा का हिस्सा है। लेकिन उसे यह विश्वास दिलाना कि कठिनाई के बावजूद संस्था उसके साथ खड़ी है—शिक्षा की आत्मा है।

 

इस घटना का जरूरी पक्ष है संवाद। शिक्षक और विद्यार्थी के बीच संवाद समाप्त होते ही शिक्षा का मानवीय पक्ष कमजोर पड़ने लगता है। अनुशासन आवश्यक है, लेकिन कठोरता और संवेदनहीनता में अंतर है। शिक्षक को परीक्षा की शुचिता बनाए रखते हुए विद्यार्थी के मानवीय जीवन मूल्यों का भी ध्यान रखना चाहिए। दूसरी ओर विद्यार्थी को भी यह समझना होगा कि अधिकारों के साथ जिम्मेदारियाँ आती हैं। मानसिक दबाव वास्तविक है, लेकिन दबाव नकल को उचित नहीं बना सकता। संस्थागत व्यवस्था में सुधार की मांग जायज हो सकती है, लेकिन अकादमिक ईमानदारी से समझौता उसका समाधान नहीं है। इसलिए इस घटना को ‘शिक्षक बनाम विद्यार्थी’ के संघर्ष में बदल देना सबसे बड़ी भूल होगी। असल बहस होनी चाहिए—हम ऐसी शिक्षा-व्यवस्था कैसे बनाएं जिसमें ईमानदारी भी बचे और इंसान भी?

 

आज उच्च शिक्षण संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य को वैकल्पिक सुविधा की तरह नहीं, शैक्षणिक व्यवस्था के अभिन्न हिस्से की तरह देखने की जरूरत है। नियमित काउंसलिंग, प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिकों की उपलब्धता, गोपनीय शिकायत-व्यवस्था, शिक्षक-विद्यार्थी संवाद, अकादमिक मेंटरिंग और संकट की स्थिति में तत्काल सहायता इन व्यवस्थाओं को संस्थागत संस्कृति का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

 

इसी के साथ परीक्षा व्यवस्था में भी तकनीक के नए दौर के अनुरूप बदलाव जरूरी है। जब चैट जीपीटी और अन्य कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरण विद्यार्थियों की पहुँच में हैं, तब केवल निगरानी बढ़ाना पर्याप्त समाधान नहीं हो सकता। परीक्षा-पद्धति को भी ऐसा बनाना होगा जिसमें रटने के बजाय समझ, तर्क, विश्लेषण, मौलिकता और समस्या-समाधान की क्षमता को अधिक महत्व मिले। ए आई के दौर में शिक्षा का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि “विद्यार्थी उत्तर कहाँ से लाया?” बल्कि यह भी है कि “क्या विद्यार्थी उत्तर को समझता है, उसका परीक्षण कर सकता है और उसे अपने ज्ञान में बदल सकता है?” यही भविष्य में शिक्षा की कसौटी होगी।

 

आईआईटी बॉम्बे की घटना हमें यह भी सिखाती है कि किसी दुखद मृत्यु के बाद तुरंत दोष तय करने की बजाय निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच को अपना काम करने देना चाहिए। मृतक के परिवार द्वारा लगाए गए जातिगत उत्पीड़न और मानसिक प्रताड़ना के आरोप गंभीर हैं, लेकिन जांच पूरी होने से पहले उन्हें अंतिम तथ्य मान लेना भी उचित नहीं होगा। दूसरी ओर, इन आरोपों को केवल इसलिए नजरअंदाज करना भी उचित नहीं कि घटना एक प्रतिष्ठित संस्थान में हुई है। न्याय का पहला सिद्धांत यही है कि हर आरोप की निष्पक्ष जांच हो और हर पक्ष को अपनी बात रखने का अवसर मिले।

 

इस घटना के बीच आईआईटी बॉम्बे के लगभग 18 सूत्रीय छात्र मांग-पत्र में मानसिक स्वास्थ्य, शिकायत-निवारण और स्वतंत्र जांच जैसे मुद्दों का सामने आना यह संकेत देता है कि विद्यार्थियों की चिंता केवल एक परीक्षा की घटना तक सीमित नहीं है। यह देश के सभी स्तर के शिक्षण संस्थानों के लिए आत्ममंथन का अवसर है।

 

हमें तय करना होगा कि विश्वविद्यालय और आईआईटी जैसे उच्च शिक्षण संस्थान केवल उत्कृष्ट मस्तिष्क पैदा करने वाली मशीनें होंगी या जिम्मेदार, संवेदनशील और नैतिक मनुष्य तैयार करने वाली विश्वविद्यालय भी?

 

यदि कोई विद्यार्थी एक परीक्षा में हार जाता है तो उसे दूसरी परीक्षा का अवसर मिलना चाहिए। यदि वह गलती करता है तो उसे सुधार का अवसर मिलना चाहिए। यदि वह मानसिक संकट में है तो उसे सहायता मिलनी चाहिए। और यदि वह अनुशासन तोड़ता है तो नियमानुसार कार्रवाई भी होनी चाहिए—लेकिन कार्रवाई का उद्देश्य सुधार होना चाहिए, प्रतिशोध नहीं। शिक्षक का दायित्व केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं है। शिक्षक को विद्यार्थी को यह भरोसा भी देना होगा कि एक बार असफल हो जाने से जीवन का अंत नहीं हो जाता है, हमें दुबारा फिर से प्रयास करना चाहिए, ऐसी मानसिकता का विकास छात्रों में करना होगा।

 

माता-पिता की जिम्मेदारी केवल अच्छे अंक और प्रतिष्ठित संस्थान तक बच्चे को पहुँचाना नहीं है। उन्हें यह भी बताना होगा कि एक परीक्षा खराब हो सकती है, एक सेमेस्टर बिगड़ सकता है, एक प्रतियोगिता में हार हो सकती है—लेकिन जीवन इन सबसे कहीं बहुत बड़ा है। और संस्थानों की जिम्मेदारी केवल प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को आगे बढ़ाना नहीं है। उन्हें संघर्ष कर रहे विद्यार्थियों के लिए भी ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें वे सहायता मांगने में शर्म महसूस न करें।

 

शिक्षा की सफलता उस दिन होगी जब विद्यार्थी असफल होने के बाद भी कह सके कि “मैं फिर कोशिश करूंगा।” जब गलती करने वाला विद्यार्थी छिपने के बजाय शिक्षक के पास जा सके। जब शिक्षक अनुशासन बनाए रखते हुए भी विद्यार्थी की गरिमा बचा सके। जब माता-पिता परिणाम से पहले बच्चे का चेहरा पढ़ सकें। और जब कोई युवा यह महसूस न करे कि एक परीक्षा, एक गलती या एक असफलता के कारण उसके सामने जीवन के सारे दरवाजे बंद हो गए हैं।

 

आईआईटी बॉम्बे की यह घटना इसलिए केवल आईआईटी की कहानी नहीं है। यह भारत की शिक्षा-व्यवस्था के सामने रखा हुआ एक दर्पण है। इस दर्पण में हमें केवल विद्यार्थी की गलती नहीं देखनी चाहिए। हमें अपनी पूरी शिक्षा-व्यवस्था को देखना होगा। क्योंकि शिक्षा का अंतिम उद्देश्य केवल यह नहीं कि विद्यार्थी सही उत्तर लिखना सीख जाए। शिक्षा का सबसे बड़ा उद्देश्य यह है कि वह जीवन के कठिन प्रश्नों के सामने भी सही रास्ता चुनने का साहस सीख सके।

डॉ संजय कुमार सहनी ,सहायक प्राध्यापक ,इतिहास विभाग ,सब डिविजनल गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज बेनीपुर,दरभंगा

ईमेल – sksahni10111983@gmail.com

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Author: Darpan 24 News


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