राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग रूपरेखा ( NIRF) ने बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था को दिखाया आईना

दरभंगा (डॉ संजय कुमार सहनी,संपादकीय):_ जिस बिहार की धरती ने लगभग 1600 वर्ष पहले नालंदा के माध्यम से दुनिया को उच्च शिक्षा, ज्ञान, शोध और अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक संवाद का अद्भुत उदाहरण दिया था, उसी बिहार के विश्वविद्यालय आज राष्ट्रीय स्तर की उच्च शिक्षा रैंकिंग में अपेक्षित स्थान बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह स्थिति केवल चिंता का विषय नहीं, बल्कि बिहार की पूरी उच्च शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर आत्ममंथन का अवसर है।
भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय की राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग रूपरेखा–2025 की विश्वविद्यालय श्रेणी में बिहार का कोई भी विश्वविद्यालय शीर्ष 100 में स्थान नहीं बना सका। डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा 101–150 के स्थान-समूह में तथा दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय 151–200 के स्थान-समूह में रहा। हालांकि, यह भी उल्लेखनीय है कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, पटना ने राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग की समग्र श्रेणी में 36वां स्थान प्राप्त किया है। इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि बिहार में कोई भी उच्च शिक्षण संस्थान राष्ट्रीय स्तर पर अच्छा प्रदर्शन नहीं कर रहा है। वास्तविक चिंता राज्य के व्यापक विश्वविद्यालयीय तंत्र की स्थिति को लेकर है। यह प्रश्न इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि बिहार की पहचान कभी नालंदा और विक्रमशिला जैसे विश्वविख्यात ज्ञान-केंद्रों से बनी थी।
नालंदा महाविहार का इतिहास इस बात का प्रमाण है कि बिहार की धरती कभी विश्वस्तरीय उच्च शिक्षा का केंद्र रही है। नालंदा में देश-विदेश से विद्यार्थी और विद्वान आते थे। नालंदा विश्वविद्यालय के आधिकारिक इतिहास के अनुसार, प्राचीन नालंदा लगभग आठ शताब्दियों तक ज्ञान का प्रमुख केंद्र रहा और यहां लगभग 2,000 शिक्षक तथा 10,000 विद्यार्थियों के होने का उल्लेख मिलता है। आज जब उसी बिहार के विश्वविद्यालयों को राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग की शीर्ष 100 विश्वविद्यालय सूची में स्थान बनाने में कठिनाई हो रही है, तो सवाल केवल रैंकिंग का नहीं है। असली सवाल यह है कि हमने नालंदा की ज्ञान-परंपरा से क्या सीखा?
नालंदा की सबसे बड़ी शक्ति उसका भवन नहीं था। उसकी शक्ति थी—योग्य शिक्षक, गंभीर विद्यार्थी, स्वतंत्र बौद्धिक विमर्श, व्यापक ज्ञान-संसाधन, शोध की परंपरा और दुनिया भर के विद्वानों के साथ संवाद।
आज बिहार के विश्वविद्यालयों को भी इन्हीं बुनियादी तत्वों पर लौटने की आवश्यकता है।
उच्च शिक्षा की गुणवत्ता का सबसे महत्वपूर्ण आधार शिक्षक हैं। यदि विश्वविद्यालय और महाविद्यालय पर्याप्त संख्या में नियमित सहायक प्राध्यापक, सह-प्राध्यापक और आचार्य के बिना संचालित होंगे, तो उनसे विश्वस्तरीय शोध और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की अपेक्षा करना कठिन होगा । शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा करने के लिए नहीं होते। वे विद्यार्थियों में आलोचनात्मक चिंतन विकसित करते हैं, शोध छात्रों का मार्गदर्शन करते हैं, शोध परियोजनाएं तैयार करते हैं, शोध-पत्र प्रकाशित करते हैं और संस्थान की अकादमिक पहचान को व्यापक स्तर पर स्थापित करते हैं। इसलिए बिहार में शिक्षक नियुक्ति को खर्च नहीं, बल्कि दीर्घकालिक बौद्धिक निवेश के रूप में देखा जाना चाहिए।
बिहार की उच्च शिक्षा व्यवस्था की चर्चा अतिथि सहायक प्राध्यापकों की भूमिका को नजरअंदाज करके पूरी नहीं की जा सकती। वर्षों से राज्य के अनेक विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में अतिथि सहायक प्राध्यापक नियमित शिक्षकों की कमी के बीच कक्षाओं का संचालन, विद्यार्थियों का मार्गदर्शन और शैक्षणिक गतिविधियों को निरंतर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। ऐसे में उन्हें केवल “अस्थायी व्यवस्था” या “तत्कालीन विकल्प” के रूप में देखना वास्तविकता को अधूरा प्रस्तुत करना होगा। यदि कोई शिक्षक वर्षों तक विश्वविद्यालय की शैक्षणिक व्यवस्था का हिस्सा रहा है, हजारों विद्यार्थियों को पढ़ाया है, शोधार्थियों का मार्गदर्शन किया है और विभाग की शैक्षणिक गतिविधियों में योगदान दिया है, तो उसके अनुभव, योग्यता और लंबे अकादमिक योगदान का मूल्यांकन भी उच्च शिक्षा नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए। विडंबना यह है कि एक ओर विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की कमी बनी हुई है और दूसरी ओर ऐसे योग्य शिक्षक वर्षों से अपनी सेवाएं दे रहे हैं। यह स्थिति केवल रोजगार का प्रश्न नहीं, बल्कि शैक्षणिक संसाधनों के बेहतर उपयोग का प्रश्न भी है।
किसी भी विश्वविद्यालय की अकादमिक गुणवत्ता एक दिन में तैयार नहीं होती। वर्षों तक विद्यार्थियों को पढ़ाने, शोध कार्य करने, विभागीय गतिविधियों में भाग लेने और विश्वविद्यालय की शैक्षणिक जरूरतों को पूरा करने से शिक्षक एक संस्थागत अनुभव अर्जित करता है। इसलिए नियमित नियुक्ति की प्रक्रिया अपनी जगह आवश्यक है, लेकिन उसके साथ यह भी विचार किया जाना चाहिए कि वर्षों से विश्वविद्यालयों में सेवा दे रहे योग्य अतिथि सहायक प्राध्यापकों के अनुभव और अकादमिक योगदान को किस प्रकार संस्थागत रूप से संरक्षित एवं उपयोग किया जाए।
सरकार यदि शिक्षक नियुक्ति के लिए कोई विशेष नीति अथवा चयन प्रक्रिया बनाती है, तो उसमें योग्यता, अनुभव, शोध उपलब्धि, शिक्षण अनुभव और विश्वविद्यालय में दी गई दीर्घकालीन सेवा जैसे मानकों को उचित महत्व देते हुए उनकी सेवा को स्थायी किया जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
इससे एक ओर अनुभवी शिक्षकों को न्याय मिलेगा, दूसरी ओर विश्वविद्यालयों को प्रशिक्षित और अनुभवी मानव संसाधन का लाभ मिलेगा। यह धारणा भी उचित नहीं है कि अतिथि शिक्षक केवल कक्षाएं लेने तक सीमित होते हैं। अनेक अतिथि सहायक प्राध्यापक शोध कार्य, शोध-पत्र लेखन, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में भागीदारी तथा विद्यार्थियों के अकादमिक मार्गदर्शन से जुड़े रहे हैं। यदि ऐसे शिक्षकों को दीर्घकालिक अकादमिक स्थिरता, शोध की सुविधाएं और संस्थागत सहयोग मिले, तो वे विश्वविद्यालयों की अनुसंधान संस्कृति को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए अतिथि शिक्षकों को केवल शिक्षण व्यवस्था की कमी पूरी करने वाला मानव संसाधन मानने के बजाय शोध एवं अकादमिक विकास की संभावित शक्ति के रूप में देखना चाहिए।
बिहार के विश्वविद्यालयों की समस्या का स्थायी समाधान केवल नए पद सृजित करना नहीं है। आवश्यकता है कि उपलब्ध योग्य मानव संसाधन का भी प्रभावी उपयोग किया जाए। एक तरफ स्वीकृत पदों को नियमित नियुक्तियों से भरना चाहिए और दूसरी तरफ लंबे समय से सेवा दे रहे योग्य अतिथि सहायक प्राध्यापकों के लिए न्यायसंगत, पारदर्शी और योग्यता आधारित अवसर सुनिश्चित किए जाने चाहिए। ऐसी नीति में शिक्षण अनुभव, शोध उपलब्धि, शैक्षणिक योग्यता और विश्वविद्यालय में दी गई सेवा अवधि जैसे मानकों को उचित महत्व दिया जा सकता है। यह व्यवस्था किसी भी प्रकार से योग्यता के सिद्धांत से समझौता नहीं होनी चाहिए, बल्कि योग्यता और अनुभव दोनों को महत्व देने वाली व्यवस्था होनी चाहिए।
राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग में अनुसंधान एवं व्यावसायिक गतिविधियां एक महत्वपूर्ण मूल्यांकन क्षेत्र हैं। इसका अर्थ स्पष्ट है कि आज विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा केवल इस बात से निर्धारित नहीं होती कि वहां से कितने विद्यार्थी डिग्री लेकर निकले, बल्कि इस बात से भी होती है कि उस विश्वविद्यालय ने ज्ञान के क्षेत्र में नया क्या जोड़ा। इसके लिए राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय शोध परियोजनाएं, पर्याप्त शोध-वित्त पोषण, उच्च गुणवत्ता वाले शोध-पत्र, प्रतिष्ठित शोध-सूचकांकित पत्रिकाओं में प्रकाशन, पेटेंट, नवाचार, उद्योग एवं शैक्षणिक संस्थानों के बीच सहयोग तथा अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक संस्थानों के साथ अकादमिक सहयोग को विश्वविद्यालयों की प्राथमिकता बनाना होगा।
आज का विश्वविद्यालय आधुनिक डिजिटल संसाधनों के बिना राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता। विश्वविद्यालयों में पर्याप्त मानक पुस्तकों के साथ ई-पुस्तकें, ई-पत्रिकाएं, अंतरराष्ट्रीय शोध-सूचनाकोष, डिजिटल शोध-संग्रह, शोध-सॉफ्टवेयर और शोध-नकल पहचान प्रणाली उपलब्ध होना आवश्यक है। इसी प्रकार विज्ञान और तकनीकी विषयों में अत्याधुनिक प्रयोगशालाओं और आधुनिक शोध सुविधाओं का विकास जरूरी है।
बिहार को क्षेत्रीय स्तर पर साझा अत्याधुनिक अनुसंधान केंद्र एवं अनुसंधान सुविधाएं विकसित करनी चाहिए, ताकि महंगे उपकरणों का उपयोग एक से अधिक विश्वविद्यालयों एवं शोध संस्थानों द्वारा किया जा सके। प्राचीन नालंदा की सबसे बड़ी विशेषता उसकी अंतरराष्ट्रीय प्रकृति थी। वह किसी एक क्षेत्र या देश का ज्ञान-केंद्र नहीं था, बल्कि विभिन्न सभ्यताओं और विचार परंपराओं के बीच संवाद का केंद्र था।
आज बिहार के विश्वविद्यालयों को भी विदेशी विश्वविद्यालयों, राष्ट्रीय शोध संस्थानों, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों, भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थानों, भारतीय प्रबंध संस्थानों तथा अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ संयुक्त अनुसंधान, विद्यार्थी विनिमय, शिक्षक विनिमय और अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक सम्मेलनों की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग किसी विश्वविद्यालय की सम्पूर्ण गुणवत्ता का अंतिम प्रमाण नहीं है, लेकिन इसकी उपेक्षा भी नहीं की जा सकती।
शिक्षण, अधिगम एवं संसाधन, अनुसंधान, स्नातक परिणाम, पहुंच एवं समावेशिता तथा संस्थागत प्रतिष्ठा जैसे विभिन्न मानकों के आधार पर संस्थानों का मूल्यांकन किया जाता है। इसलिए बिहार को राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग को केवल प्रतिष्ठा की प्रतियोगिता नहीं, बल्कि शैक्षणिक स्वास्थ्य रिपोर्ट की तरह देखना चाहिए।
अब समय आ गया है कि बिहार सरकार विश्वविद्यालयों के लिए एक व्यापक “बिहार उच्च शिक्षा मिशन–2035” तैयार करे।
इस मिशन के अंतर्गत—
पहला, सभी स्वीकृत शिक्षक पदों को समयबद्ध तरीके से भरा जाए।
दूसरा, लंबे समय से विश्वविद्यालयों में योगदान दे रहे योग्य अतिथि सहायक प्राध्यापकों के अनुभव, योग्यता, शिक्षण सेवा और शोध उपलब्धियों को ध्यान में रखते हुए न्यायसंगत एवं योग्यता आधारित अवसर प्रदान किए जाएं।
तीसरा, विश्वविद्यालयों में शोध-वित्त पोषण में पर्याप्त वृद्धि की जाए।
चौथा, प्रत्येक विश्वविद्यालय में आधुनिक अनुसंधान विकास केंद्र स्थापित किया जाए।
पांचवां, प्रयोगशालाओं एवं पुस्तकालयों का चरणबद्ध आधुनिकीकरण किया जाए।
छठा, पीएच.डी. शोध की गुणवत्ता और शोध कार्य की समयबद्धता सुनिश्चित की जाए।
सातवां, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों के साथ संयुक्त अनुसंधान को बढ़ावा दिया जाए।
आठवां, प्रत्येक विश्वविद्यालय के राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग संबंधी कार्य-निष्पादन का वार्षिक शैक्षणिक लेखा-परीक्षण कराया जाए।
नौवां, उत्कृष्ट शोध करने वाले शिक्षकों और शोधार्थियों को संस्थागत प्रोत्साहन दिया जाए।
दसवां, विश्वविद्यालयों में उद्योग एवं शैक्षणिक संस्थानों के बीच सहयोग तथा अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक सहयोग को संस्थागत रूप दिया जाए।
यदि नालंदा ने हमें कोई सबसे बड़ी सीख दी है तो वह है—ज्ञान में निवेश, योग्य शिक्षकों का सम्मान, शोध की स्वतंत्रता, व्यापक ज्ञान-संसाधन और दुनिया के साथ संवाद। इसलिए आज बिहार के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिंग में हमारी स्थिति क्या है। असली प्रश्न यह है की
क्या हमारे विश्वविद्यालयों में पर्याप्त संख्या में शिक्षक हैं?
क्या वर्षों से विश्वविद्यालयों में योगदान दे रहे अतिथि सहायक प्राध्यापकों के अनुभव और योग्यता का उचित उपयोग हो रहा है?
क्या हमारे शोधार्थियों को आधुनिक शोध-संसाधन उपलब्ध हैं?
क्या हमारी प्रयोगशालाएं अत्याधुनिक हैं?
क्या हमारी पुस्तकालयों में दुनिया का नवीनतम ज्ञान उपलब्ध है?
क्या हमारे शिक्षक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोध कर रहे हैं?
क्या हमारे विश्वविद्यालय देश-विदेश के विद्यार्थियों और विद्वानों को आकर्षित करने की क्षमता रखते हैं?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर सकारात्मक होगा, तो राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में सुधार स्वाभाविक रूप से दिखाई देगा।
बिहार की समस्या प्रतिभा की कमी नहीं है। बिहार के विद्यार्थी और शिक्षक देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रहे हैं। चुनौती यह है कि उस प्रतिभा को अपने ही विश्वविद्यालयों में पर्याप्त अवसर, संसाधन और सम्मान मिले।
अतिथि सहायक प्राध्यापक इसी प्रतिभा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उन्हें वर्षों तक केवल अस्थायी मानकर उनकी सेवा और अनुभव को नजरअंदाज करना बिहार की उच्च शिक्षा के लिए भी नुकसानदेह हो सकता है। नियमित शिक्षक नियुक्तियां आवश्यक हैं, लेकिन वर्षों से सेवा दे रहे योग्य अतिथि शिक्षकों के अनुभव और योगदान को नकारकर उच्च शिक्षा का स्थायी समाधान नहीं निकाला जा सकता।
बिहार की धरती ने दुनिया को नालंदा दिया था। अब आवश्यकता इस बात की है कि बिहार ऐसा आधुनिक उच्च शिक्षा तंत्र विकसित करे जो नालंदा की ऐतिहासिक स्मृति पर गर्व करने के साथ-साथ वर्तमान में भी ज्ञान, शोध और नवाचार का राष्ट्रीय केंद्र बन सके। इसके लिए योग्य शिक्षक, अनुभवी अतिथि सहायक प्राध्यापक, गुणवत्तापूर्ण शोध, आधुनिक प्रयोगशालाएं, समृद्ध पुस्तकालय, पर्याप्त शोध-वित्त पोषण और अंतरराष्ट्रीय अकादमिक सहयोग—इन सभी को एक साथ आगे बढ़ाना होगा।
नालंदा की विरासत केवल अतीत की कहानी नहीं है। यह वर्तमान बिहार के लिए एक शैक्षणिक चुनौती और भविष्य के लिए एक संकल्प है।
बिहार को अब केवल नालंदा के गौरव की कहानी सुनाने वाला राज्य नहीं, बल्कि आधुनिक नालंदा जैसी ज्ञान-परंपरा को अपने विश्वविद्यालयों में पुनर्जीवित करने वाला राज्य बनना होगा।
डॉ. संजय कुमार सहनी,सहायक प्राध्यापक ,इतिहास विभाग ,सब डिविजनल गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज, बेनीपुर, दरभंगा ,Email ID – sksahni10111983@gmail.com,Mobile NO – 8709714156
Author: Darpan 24 News










