डॉ. संजय कुमार सहनी;_भारत में दशहरा केवल एक धार्मिक त्योहार नहीं, बल्कि इतिहास, पौराणिक स्मृति, कृषि-जीवन और सामाजिक संस्कृति के परस्पर संबंधों को समझने का एक महत्त्वपूर्ण अवसर है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को मनाया जाने वाला यह त्यौहार असत्य पर सत्य, अन्याय पर न्याय और अहंकार पर विवेक की विजय का प्रतीक माना जाता है। उत्तर भारत में यह भगवान राम द्वारा रावण-वध और पूर्वी भारत में देवी दुर्गा द्वारा महिषासुर-वध से जुड़ा है। दक्षिण भारत में मैसूर का दशहरा, पश्चिम भारत में शमी-पूजन तथा पूर्वोत्तर और मध्य भारत के अनेक क्षेत्रों में स्थानीय देवी-देवताओं एवं समुदायों से जुड़ी विशिष्ट परंपराएँ इसके बहुआयामी स्वरूप को सामने लाती हैं।

लेकिन इतिहास का एक बुनियादी प्रश्न है: दशहरा मनाने की परंपरा वास्तव में कब आरंभ हुई? क्या इसका उल्लेख प्राचीनतम भारतीय साहित्य में मिलता है, और राम-विजय तथा दुर्गा-विजय की कथाएँ इस पर्व से किस प्रकार जुड़ीं?

इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए धार्मिक आस्था का सम्मान करते हुए पौराणिक आख्यानों, संस्कृत साहित्य, धार्मिक अनुष्ठान-विधियों और इतिहासकारों के शोध को अलग-अलग समझना आवश्यक है।
दशहरा के प्रचलित अर्थ का सबसे प्रसिद्ध आधार रामकथा है। रामायण के अनुसार, लंका के राजा रावण ने सीता का अपहरण किया। सीता की खोज में राम की सहायता हनुमान और वानर-सेना ने की। अंततः राम और रावण के बीच युद्ध हुआ, जिसमें रावण मारा गया और सीता की मुक्ति हुई। यह कथा भारतीय समाज में धर्म, कर्तव्य, मर्यादा और न्याय की स्थापना के आदर्श के रूप में प्रतिष्ठित हुई।
इस प्रसंग का प्रमुख साहित्यिक स्रोत महर्षि वाल्मीकि से संबद्ध वाल्मीकि रामायण है। उसके युद्धकांड में राम-रावण युद्ध और रावण-वध का विस्तृत वर्णन मिलता है। बाद की रामकथाओं, विशेषकर गोस्वामी तुलसीदास की रामचरितमानस ने भी राम के आदर्श और विजय की गाथा को जनभाषा में व्यापक लोकप्रियता प्रदान की।
रामकथा का साहित्यिक विकास लंबी अवधि में हुआ। वाल्मीकि रामायण के विभिन्न अंशों की रचना और संपादन की तिथियों पर विद्वानों में मतभेद हैं। इसलिए उसके लिए किसी एक निर्विवाद रचनाकाल का दावा करना उचित नहीं होगा। इतना कहा जा सकता है कि रामकथा प्राचीन भारतीय साहित्य की एक महत्त्वपूर्ण परंपरा है, जिसने सदियों के दौरान विविध भाषाओं, क्षेत्रों और लोककलाओं में अनेक रूप ग्रहण किए।
राम-विजय को आश्विन शुक्ल दशमी के साथ जोड़कर मनाने की परंपरा के विकास को समझने के लिए साहित्य के साथ-साथ बाद की धार्मिक प्रथाओं, क्षेत्रीय इतिहास और रामलीला जैसी सार्वजनिक प्रस्तुतियों का अध्ययन भी आवश्यक है।
दशहरा की ऐतिहासिकता का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष देवी दुर्गा की उपासना और महिषासुर-वध की पौराणिक कथा है। इसका प्रमुख ग्रंथीय आधार मार्कण्डेय पुराण में अंतर्निहित देवीमाहात्म्य है, जिसे दुर्गासप्तशती अथवा चण्डीपाठ भी कहा जाता है। यह ग्रंथ देवी-उपासना के इतिहास में विशेष महत्त्व रखता है। इसमें देवी की शक्ति, देवताओं की रक्षा तथा असुरों के विनाश से संबंधित आख्यानों का वर्णन है।

पौराणिक कथा के अनुसार, महिषासुर नामक असुर ने अपनी शक्ति के बल पर देवताओं को पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। पराजित देवताओं की शक्तियों के एकत्र होने से देवी का प्राकट्य हुआ। देवताओं ने उन्हें विभिन्न आयुध प्रदान किए। देवी ने महिषासुर और उसकी सेना से युद्ध किया तथा अंततः उसका वध करके देवताओं को संकट से मुक्त कराया। इसीलिए देवी का एक प्रमुख नाम ‘महिषासुरमर्दिनी’ पड़ा।
देवीमाहात्म्य में यह कथा केवल किसी युद्ध का वर्णन नहीं है। इसके धार्मिक अर्थ में देवी उस शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं जो संकट के समय व्यवस्था की पुनर्स्थापना करती है। इस आख्यान में स्त्री-शक्ति को सर्वोच्च दैवी शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।
यहाँ एक महत्त्वपूर्ण तथ्य ध्यान देने योग्य है। दुर्गा अथवा देवी के विभिन्न रूपों की उपासना और देवीमाहात्म्य में वर्णित विकसित धार्मिक परंपरा को एक ही ऐतिहासिक समय की घटना नहीं मानना चाहिए।
इतिहासकार बिहानी सरकार की पुस्तक Heroic Shāktism: The Cult of Durgā in Ancient Indian Kingship में तीसरी से बारहवीं शताब्दी ईस्वी के बीच दुर्गा-उपासना और सैन्य संस्कृति के संबंधों का विश्लेषण किया गया है। उनके शोध के अनुसार, गुप्त साम्राज्य के बाद क्षेत्रीय राज्यों के उभार और बदलती राजनीतिक परिस्थितियों के बीच दुर्गा की उपासना का महत्त्व बढ़ा। देवी की शक्ति को राजकीय संरक्षण, युद्ध में विजय और राज्य की सुरक्षा से भी जोड़ा गया।

देवीमाहात्म्य की रचना-तिथि पर विद्वानों में मतभेद हैं, लेकिन सामान्यतः इसे आरंभिक मध्यकाल से पहले की विकसित संस्कृत धार्मिक परंपरा का महत्त्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है। मार्कण्डेय पुराण की उपलब्ध पांडुलिपि-परंपरा और ग्रंथ के विभिन्न स्तरों का अध्ययन इसकी तिथि निर्धारित करने में उपयोगी है। इससे इतना निष्कर्ष अवश्य निकलता है कि दुर्गा-उपासना की विकसित परंपरा का लिखित साहित्यिक आधार मध्यकाल के आरंभ तक स्थापित हो चुका था।
दशहरा की प्राचीनता पर विचार करते समय वेदों, ब्राह्मण ग्रंथों, उपनिषदों, रामायण, महाभारत और पुराणों के बीच अंतर को समझना भी आवश्यक है। ऋग्वेद भारतीय साहित्य की प्राचीनतम उपलब्ध साहित्यों में से एक है। उसमें अनेक देवताओं, यज्ञों, प्राकृतिक शक्तियों और धार्मिक विधि विधानों का वर्णन मिलता है। किंतु वर्तमान दशहरा उत्सव, रावण-दहन अथवा नौ रातों की दुर्गा-पूजा को उसी रूप में ऋग्वैदिक परंपरा से जोड़ने के लिए पर्याप्त प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।
देवीमाहात्म्य देवी-विजय की कथा का प्रमुख स्रोत है, जबकि वाल्मीकि रामायण राम-रावण युद्ध का महत्त्वपूर्ण साहित्यिक स्रोत है। इन ग्रंथों में वर्णित आख्यानों ने बाद की धार्मिक परंपराओं को अर्थ प्रदान किया; लेकिन वर्तमान उत्सव के प्रत्येक अनुष्ठान की शुरुआत इन्हीं ग्रंथों के रचनाकाल में हुई थी, ऐसा मानना ऐतिहासिक दृष्टि से उचित प्रतीत नहीं लगता है।
इसलिए अधिक सटीक निष्कर्ष यह है कि दशहरा किसी एक प्राचीन ग्रंथ में संपूर्ण रूप से निर्धारित उत्सव के रूप में सामने नहीं आता, बल्कि विभिन्न धार्मिक आख्यानों, अनुष्ठानों और क्षेत्रीय परंपराओं के ऐतिहासिक विकास से उसका बहुरंगी स्वरूप निर्मित हुआ।
दशहरा की परंपरा के ऐतिहासिक विकास को समझने के लिए प्राचीन और मध्यकालीन राजसत्ता की भूमिका पर ध्यान देना आवश्यक है। इतिहासकारों ने दिखाया है कि शरद ऋतु में देवी की उपासना केवल व्यक्तिगत धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं रही, बल्कि अनेक राज्यों में राजकीय अनुष्ठान, युद्ध की तैयारी, शस्त्र-पूजन और सामुदायिक आयोजन का रूप भी ग्रहण करती गई।
बिहानी सरकार के शोध के अनुसार, लगभग आठवीं-नवीं शताब्दी तक पूर्वी भारत में नौ रातों के विस्तृत शारदीय अनुष्ठान के प्रमाण सामने आने लगते हैं। इसके बाद विभिन्न क्षेत्रों में इस परंपरा का विकास अलग-अलग ढंग से हुआ। दक्षिण भारत में लगभग बारहवीं शताब्दी से नवरात्र की विशिष्ट राजकीय परंपराओं का विस्तार हुआ। विजयनगर साम्राज्य में नवरात्र का आयोजन राजकीय वैभव और सत्ता के प्रदर्शन से भी जुड़ा था।
इस ऐतिहासिक विकास का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष मिथिला भी है। बिहानी सरकार के अध्ययन में कर्नाट और ओइनवार राजवंशों की परंपराओं का उल्लेख मिलता है। विशेष रूप से मैथिल विद्वान विद्यापति द्वारा वर्णित ओइनवार राजदरबार के शारदीय देवी-अनुष्ठान में देवी-पूजा के साथ घोड़ों और शस्त्रों की पूजा, राजा के अभिषेक तथा राजकीय वैभव का वर्णन मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि मध्यकालीन मिथिला में देवी-उपासना और राजसत्ता के संबंध का एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक आधार था।
यह संदर्भ दरभंगा और व्यापक मिथिला क्षेत्र के पाठकों के लिए विशेष महत्त्व रखता है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि इस क्षेत्र में धार्मिक अनुष्ठान केवल मंदिर अथवा परिवार तक सीमित नहीं थे; वे राजकीय प्रतिष्ठा, सामाजिक संगठन और सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़े हुए थे।
आज दशहरा की सबसे लोकप्रिय छवियों में रामलीला का मंचन और रावण, कुंभकर्ण तथा मेघनाद के पुतलों का दहन शामिल है। किंतु इन सार्वजनिक आयोजनों का इतिहास रामायण की कथा से अलग अध्ययन की माँग करता है।

रामलीला रामकथा का नाटकीय एवं सामुदायिक रूपांतरण है। भारत सरकार की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत संबंधी सामग्री तथा यूनेस्को के विवरण के अनुसार, उत्तर भारत की अनेक रामलीलाएँ तुलसीदास की सोलहवीं शताब्दी की रामचरितमानस पर आधारित हैं। यूनेस्को ने रामलीला को 2008 में मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में सम्मिलित किया।
यह तथ्य रामलीला के सांस्कृतिक महत्त्व को प्रमाणित करता है, लेकिन रामलीला की सभी क्षेत्रीय शैलियाँ पंद्रहवीं सोलहवीं शताब्दी में ही आरंभ हुई। इसी प्रकार, आज प्रचलित विशाल रावण-पुतला दहन की परंपरा की शुरुआत का कोई एक सर्वमान्य ऐतिहासिक वर्ष निर्धारित करना कठिन है।
वस्तुतः रामकथा के पाठ, लोकनाट्य, धार्मिक जुलूस, सार्वजनिक मेले और पुतला-दहन अलग-अलग ऐतिहासिक प्रक्रियाओं के माध्यम से विकसित हुए। समय के साथ इनका मेल दशहरा के लोकप्रिय स्वरूप का हिस्सा बन गया।
इस प्रकार, दशहरा धार्मिक आख्यानों को सामूहिक स्मृति में जीवित रखने वाली एक सशक्त सांस्कृतिक परंपरा भी है। रामलीला में दर्शक केवल कथा सुनते नहीं, बल्कि उसके अभिनय, संगीत और सामुदायिक आयोजन में सहभागी बनते हैं। यही विशेषता इसे पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक ज्ञान के हस्तांतरण का माध्यम बनाती है।
रामलीला, राम-रावण युद्ध के मंचन, मेलों और पुतला-दहन के माध्यम से यह परंपरा व्यापक जनभागीदारी का रूप लेती है।
महिषासुरमर्दिनी दुर्गा की उपासना, प्रतिमा-विसर्जन और विजयादशमी की परंपराएँ यहाँ प्रमुख हैं। बंगाल की दुर्गा-पूजा का सामाजिक इतिहास औपनिवेशिक काल में भी महत्त्वपूर्ण रूप से विकसित हुआ।
दक्षिण भारत में मैसूर का दशहरा राजकीय समारोह, देवी-उपासना और सार्वजनिक जुलूसों से जुड़ा है। विजयनगर की राजकीय नवरात्र परंपरा इस व्यापक ऐतिहासिक विकास को समझने का महत्त्वपूर्ण संदर्भ है।
बस्तर का दशहरा स्थानीय देवी, समुदायों और राजकीय इतिहास से जुड़ी विशिष्ट परंपरा है। इसे केवल राम-रावण युद्ध के सामान्य आख्यान तक सीमित नहीं किया जा सकता। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि भारत में दशहरा कोई एकरूप धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। इसकी व्यापक सांस्कृतिक पहचान के भीतर अनेक क्षेत्रीय इतिहास और धार्मिक अर्थ समाहित हैं। कहीं राम-विजय केंद्र में है, कहीं देवी की शक्ति, कहीं राजकीय परंपरा और कहीं स्थानीय समुदाय की सांस्कृतिक स्मृति।
दशहरा की ऐतिहासिकता का एक अन्य पक्ष कृषि और ऋतुचक्र से जुड़ा है। भारतीय उपमहाद्वीप में शरद ऋतु का आगमन वर्षा ऋतु के बाद होता है। अनेक समाजों में इस समय धार्मिक अनुष्ठान, सामुदायिक उत्सव और नई ऋतु के स्वागत की परंपराएँ विकसित हुईं।
बंगाल की दुर्गा-पूजा पर किए गए अध्ययनों में कृषि, अनाज, वनस्पति और देवी की प्रतिमा-परंपरा के संबंधों पर भी चर्चा की गई है। इतिहासकारों ने यह संभावना प्रस्तुत की है कि कुछ अनुष्ठानों का संबंध शरद ऋतु और कृषि-जीवन से भी रहा है, जबकि देवी के युद्ध और विजय संबंधी आख्यानों ने उन्हें अलग धार्मिक अर्थ प्रदान किए।
हालाँकि यह कहना कि दशहरा मूलतः केवल कृषि-पर्व था और बाद में उसे धार्मिक स्वरूप दिया गया, उपलब्ध प्रमाणों से अधिक व्यापक शोध के पश्चात निष्कर्ष तक पहुंचेगा। ऐतिहासिक व्याख्या यह है कि ऋतुचक्र, देवी-उपासना, राजकीय अनुष्ठान और पौराणिक आख्यान अलग-अलग संदर्भों में विकसित हुए तथा अनेक स्थानों पर एक-दूसरे से जुड़े।
दशहरा के ऐतिहासिक अध्ययन का उद्देश्य केवल इसकी प्राचीनता निर्धारित करना नहीं है। इसका एक व्यापक सामाजिक प्रश्न भी है, आज यह पर्व हमें क्या सिखाता है?
रामकथा को नैतिक दृष्टि से पढ़ें तो उसमें कर्तव्य, मर्यादा, संघर्ष और न्याय की स्थापना जैसे विषय सामने आते हैं। दुर्गा-महिषासुर आख्यान शक्ति, संकट के प्रतिरोध और व्यवस्था की पुनर्स्थापना का प्रतीक बनता है। इन दोनों परंपराओं का साझा नैतिक अर्थ यह है कि शक्ति का उपयोग अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध होना चाहिए। किसी भी पर्व की सार्थकता तब अधिक बढ़ती है, जब हम अपने सामाजिक व्यवहार को सार्वजनिक जीवन और संस्थाओं में न्याय, सत्यनिष्ठा तथा उत्तरदायित्व के साथ महत्त्व देंगे।
यदि हमलोग रावण-दहन के साथ भ्रष्टाचार, हिंसा, स्त्रियों के प्रति भेदभाव, सामाजिक घृणा, अंधविश्वास और पर्यावरण के विनाश जैसी वास्तविक समस्याओं पर भी विचार करें, तो त्योहार की नैतिक शिक्षा वर्तमान जीवन से जुड़ सकती है।
इस संदर्भ में दशहरा आत्ममंथन का अवसर है। बाहरी प्रतीकों का महत्त्व अपनी जगह है, लेकिन किसी समाज की वास्तविक प्रगति इस बात से भी आँकी जाती है कि वह अपने कमजोर और वंचित नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार करता है तथा अन्याय के विरुद्ध कितनी जिम्मेदारी से खड़ा होता है।
दशहरा की परंपरा की ऐतिहासिक पड़ताल से एक महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष सामने आता है। इसके वर्तमान स्वरूप को किसी एक घटना, ग्रंथ अथवा ऐतिहासिक तिथि से पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। रामायण में राम-रावण युद्ध का आख्यान, मार्कण्डेय पुराण के अंतर्गत देवीमाहात्म्य में दुर्गा-महिषासुर कथा, शारदीय नवरात्र के धार्मिक अनुष्ठान, मध्यकालीन राजकीय परंपराएँ और रामलीला जैसी लोककलाएँ—इन सभी ने अलग-अलग स्तरों पर इस उत्सव की सांस्कृतिक पहचान को आकार दिया है।
इतिहासकार बिहानी सरकार का शोध यह दिखाता है कि देवी-उपासना और नवरात्र की राजकीय परंपराओं का विकास प्राचीन तथा मध्यकालीन भारत की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों से भी जुड़ा था। वहीं रामलीला के संबंध में यूनेस्को के दस्तावेज यह प्रमाणित करते हैं कि रामकथा ने सार्वजनिक कला और सामुदायिक सहभागिता के माध्यम से दीर्घकालीन सांस्कृतिक जीवन प्राप्त किया।
इसलिए दशहरा की प्राचीनता पर विचार करते समय न तो सभी वर्तमान परंपराओं को बिना प्रमाण हजारों वर्ष पुराना घोषित करना चाहिए और न ही पौराणिक आख्यानों की सांस्कृतिक भूमिका की उपेक्षा करनी चाहिए। इतिहास का काम उपलब्ध प्रमाणों की जाँच करना, विभिन्न कालखंडों के बीच अंतर स्पष्ट करना और परंपराओं के विकास को समझना है।
दशहरा की वास्तविक ऐतिहासिक महत्ता इसी बहुलता में निहित है की यह भारत की उस सांस्कृतिक यात्रा का प्रतीक है, जिसमें धार्मिक आख्यान, लोकस्मृति, राजकीय अनुष्ठान और सामाजिक जीवन परस्पर संवाद करते हुए वर्तमान तक पहुँचे हैं। विजयादशमी का संदेश भी तभी अधिक सार्थक होगा, जब सत्य और न्याय की विजय केवल पौराणिक कथा या उत्सव का प्रतीक न रहकर हमारे व्यक्तिगत आचरण और सामूहिक जीवन का उद्देश्य बने।
Author: Sanjay Kumar Sahni










