
दरभंगा, हिन्द स्वराज पीठ, दरभंगा द्वारा आयोजित तीन दिवसीय प्रशिक्षण शिविर के दूसरे दिन महात्मा गांधी की कालजयी कृति ‘हिन्द स्वराज’ को नए वैचारिक दृष्टिकोण और समकालीन सामाजिक संदर्भों में समझने का प्रयास किया गया। विभिन्न वक्ताओं ने अपने विचारों के माध्यम से गांधी के चिंतन को वर्तमान समय की चुनौतियों से जोड़ते हुए नशामुक्ति, शिक्षा, आत्मानुशासन, आत्मनियंत्रण तथा नैतिक जीवन-मूल्यों जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से प्रकाश डाला।

प्रोफेसर डॉ विद्यानाथ झा जी ने कहा कि ‘हिन्द स्वराज’ के संदेश को गांव गांव में जाकर प्रचारित प्रसारित करना होगा। क्योंकि गांधी जी का मानना था कि भारत गांव में बसता है और जो भी सुधार करना चाहते हैं उसकी शुरूआत गांव से करनी होगी। गांधी के स्वराज की अवधारणा को केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं किया जा सकता। इसका वास्तविक अर्थ व्यक्ति का अपने विचारों, इच्छाओं, व्यवहार और जीवन पर नियंत्रण स्थापित करना है। जब तक व्यक्ति स्वयं पर शासन करना नहीं सीखता, तब तक वास्तविक स्वराज की स्थापना अधूरी रहती है।
प्रशिक्षण शिविर में डॉ आर बी ठाकुर ने नशे की बढ़ती प्रवृत्ति और उसके सामाजिक दुष्परिणामों पर विस्तार से बताएं कि नई युवा पीढ़ी में नशे की लत के लिए उनके अभिभावक ही जिम्मेवार हैं। उन्होंने नशे को व्यक्ति के स्वास्थ्य, पारिवारिक जीवन, आर्थिक स्थिति तथा सामाजिक जिम्मेदारियों के लिए गंभीर चुनौती बताते हुए गांधीवादी जीवन-दृष्टि के माध्यम से संयम, जागरूकता और नैतिक प्रतिबद्धता विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
शिक्षा के प्रश्न पर विचार रखते हुए डॉ संजय कुमार सहनी ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा उत्तीर्ण करना, प्रमाणपत्र प्राप्त करना अथवा रोजगार हासिल करना नहीं होना चाहिए। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए, जो व्यक्ति में विवेक, स्वतंत्र चिंतन, सामाजिक उत्तरदायित्व, श्रम के प्रति सम्मान और मानवीय संवेदना विकसित करे। हिन्द स्वराज पुस्तक का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि गांधी की बुनियादी शिक्षा संबंधी अवधारणा आज भी शिक्षा व्यवस्था को अधिक व्यावहारिक, नैतिक और समाजोपयोगी बनाने की प्रेरणा देती है।
आत्मानुशासन और आत्मनियंत्रण पर चर्चा करते हुए कार्यक्रम के संयोजक अजीत कुमार मिश्र ने कहा कि आधुनिक जीवन में बढ़ती उपभोक्तावादी प्रवृत्ति, अनियंत्रित इच्छाएँ और बाहरी आकर्षण व्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित कर रहा हैं। गांधी का विचार था कि वास्तविक स्वतंत्रता का संबंध केवल बाहरी बंधनों से मुक्ति नहीं, बल्कि अपनी इच्छाओं और आवश्यकताओं के विवेकपूर्ण नियमन से भी है। इस दृष्टि से ‘हिन्द स्वराज’ आज के युवाओं के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है।
शिविर के दौरान यह महत्वपूर्ण सुझाव भी सामने आया कि गांधी के विचारों और ‘हिन्द स्वराज’ की प्रासंगिकता पर आधारित ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों का विस्तार विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों तक किया जाना चाहिए। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि विद्यार्थियों को गांधी के विचारों से केवल पाठ्यपुस्तकों के माध्यम से परिचित कराना पर्याप्त नहीं है; उनके जीवन, व्यवहार और सामाजिक सहभागिता में इन मूल्यों को विकसित करने के लिए संवाद, प्रशिक्षण शिविर, वाद-विवाद, निबंध लेखन तथा रचनात्मक गतिविधियों का आयोजन भी आवश्यक है।
प्रशिक्षण शिविर के दूसरे दिन का मूल संदेश यही रहा कि गांधी के ‘हिन्द स्वराज’ को वर्तमान सामाजिक समस्याओं के समाधान, युवा पीढ़ी के नैतिक विकास और जिम्मेदार नागरिकता के निर्माण के संदर्भ में नए सिरे से पढ़ने तथा समझने की आवश्यकता है। इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम गांधीवादी विचारधारा को अकादमिक विमर्श से आगे बढ़ाकर समाज और शिक्षा व्यवस्था से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल साबित हो सकते हैं।
हिन्द स्वराज पीठ, दरभंगा
Author: Sanjay Kumar Sahni






