
प्रो लावण्य, प्रो पुष्पम, डॉ चौरसिया, डॉ अनुपम, डॉ वेद, नमिता, प्रो रामप्रवेश, प्रो हरि, डॉ प्रेम कुमारी ने किया संबोधित

दरभंगा :_ जीकेपीडी कॉलेज, कर्पूरीग्राम, समस्तीपुर महाविद्यालय के तत्त्वावधान में “मानव जीवन में लोककला का महत्त्व” विषय पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन महाविद्यालय के सभागार में किया गया, जिसमें विश्वविद्यालय ललित कला के संकायाध्यक्ष प्रो लावन्य कीर्ति सिंह ‘काव्या’- मुख्य अतिथि, एमआरएम कॉलेज, दरभंगा की प्रभारी प्रधानाचार्य प्रो पुष्पम नारायण- सम्मानित अतिथि, एनएसएस के विश्वविद्यालय समन्वयक-प्रथम डॉ आर एन चौरसिया, एमआरएम कॉलेज, दरभंगा की एनएसएस पदाधिकारी डॉ अनुपम प्रिया एवं पीजी संगीत एवं नाट्य विभाग के पूर्व शिक्षक डॉ वेद प्रकाश- विशिष्ट अतिथि, महाविद्यालय शाशि निकाय के अध्यक्ष नमिता ठाकुर- स्वागत कर्ता, सचिव अनिसूर रहमान एवं पूर्व सब इंस्पेक्टर उमाशंकर पासवान तथा छात्रों की ओर से अरविन्द कुमार एवं स्मृति कुमारी आदि ने वक्ता के रूप में अपने विचार व्यक्त किया।
आरंभ में अतिथियों ने कॉलेज परिसर में स्थित स्व. कर्पूरी ठाकुर, फुलेश्वरी देवी एवं गोखुल ठाकुर की प्रतिमाओं पर फूल-माला अर्पित कर श्रद्धांजलि दी। संगोष्ठी का प्रारंभ राष्ट्रगीत एवं राष्ट्रगान से हुआ। दीप प्रज्वलन के बाद अतिथियों का स्वागत पाग, चादर एवं माला से किया गया। स्वागत गीत संगीत विभाग के छात्र-छात्राओं ने किया, जबकि स्वागत संबोधन करते हुए सचिव नामित ठाकुर ने कहा कि कार्यक्रम ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणादायक है। इससे नई पीढ़ी को काफी लाभ होगा। रंगकर्मी एवं उदघोषक सागर सिंह के संचालन में आयोजित सेमिनार में धन्यवाद ज्ञापन संगीत विभाग की अध्यक्ष एवं एनएसएस पदाधिकारी डॉ प्रेम कुमारी ने करते हुए बताया कि महाविद्यालय में हाल ही में मिथिला पेंटिंग एवं मिथिला लोक संगीत के साथ ही एनएसएस का दूसरा यूनिट खुला है, जिसमें छात्र- छात्राएं बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। संगोष्ठी में तबला वादक रामचन्द्र ठाकुर, गायक हेमंत कुमार एवं गौरी शंकर ठाकुर, तबला वादक नन्द गोपाल राम, शोधार्थी साक्षी रीतू, संगीत शिक्षक सुमित कुमार, मिथिला पेंटिंग्स के समन्वयक डॉ स्नेहा, मिथिला लोक संगीत के समन्वयक डॉ प्रेम कुमारी आदि सहित 150 से अधिक व्यक्ति उपस्थित थे। इस अवसर पर सीमा, कोमल, अवनि भारती ने लोकनृत्य- कहवां गईल लड़कोइयां हो…., बैजू, अर्पण, लक्की एवं आरुही ने जट-जाटिन नृत्य, दिव्यांशी ने क्लासिकल नृत्य, अर्पण कुमार ने कथक नृत्य, दिलखुश ने राजस्थानी लोकनृत्य, अनुष्का एवं आराध्या ने बंगला लोकनृत्य की मनमोहन एवं भव्य प्रस्तुति दी। वहीं अन्य छात्र-छात्राओं ने भी झिझिया, सामा-चकेबा, छठ पर्व आदि पर आधारित लोकगीत एवं लोकनृत्य प्रस्तुत किया।
प्रो लावन्य कीर्ति सिंह ‘काव्या’ ने कहा कि लोक कलाओं के माध्यम से हम जीवन को बेहतर बना सकते हैं। यह हमारी वास्तविक पहचान है। आज लोक कलाएं मंच तक आ गई हैं। कला कभी भी हमें गलत रास्ते पर नहीं ले जा सकता। कहा कि लोककला आजीविका का भी बड़ा साधन है। हम इसी में जिए और जीवन में लोककला को अपनाए। प्रो पुष्पम नारायण ने कहा कि जीवन जीना भी एक बड़ी कला है। विशाल व्यक्तित्व के धनी एवं भारतरत्न स्व. कर्पूरी ठाकुर ने समाज को जीवन जीना सिखाया है और गीत, नृत्य, काष्ठ, मिट्टी, हस्तकला, लघु, कुटीर उद्योगों आदि लोक कलाओं के माध्यम से स्वावलंबी बनाया। कहा कि प्रत्येक व्यक्ति में कोई न कोई कला जरूर होती है जो उन्हें आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करती है।
डॉ आर एन चौरसिया ने कला के महत्त्वों को रेखांकित करते हुए कहा कि लोककला हमारे समाज की आत्मा एवं सांस्कृतिक विरासत का जीवन्त स्वरूप है जो अतीत को वर्तमान से जोड़ती है। यह किसी क्षेत्र के सामान्य जनजीवन, परंपराओं, रीति-रिवाजों, धार्मिक विश्वासों, प्रकृति प्रेम और सामाजिक अनुभवों की कलात्मक अभिव्यक्ति है। कहा कि लोककला किसी समुदाय या क्षेत्र की विशिष्ट पहचान को बनाए रखने में सहायक होती है जो मनोरंजन के साथ ही शिक्षा एवं जन-जागरूकता का प्रभावी माध्यम है। डॉ अनुपम प्रिया ने कहा कि भारत विविधताओं का देश है, जहां के हर क्षेत्र की अपनी विशेषता एवं लोककला होती है, जिसे हम एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक स्थानांतरित करते हैं। कहा कि कला हमारे मानसिक स्वास्थ्य को ठीक करता है तथा खुशियां प्रदान करता है। डॉ वेद प्रकाश ने कहा कि किसी भी कार्य को सलीके से करना ही कला है, ताकि उसमें रोचकता उत्पन्न हो जाए। कहा कि हमारा पूरा जीवन कलाओं से आच्छादित है जो हमें सार्थक इंसान बनाती है। यह हमें जड़ों से जोड़ती है। लोककला सभी कलाओं का मूल है। शिक्षक प्रो हरि प्रसाद राय ने कहा कि कला और जीवन में गहरा संबंध है, जिसके विविध रूप हैं। कला से मानव जीवन निखरता है और इसके बिना हमारा जीवन अधूरा है। अध्यक्षीय संबोधन में प्रो रामप्रवेश ठाकुर ने कहा कि मानव जीवन में कला का काफी महत्त्व है। इसके बिना जीवन ठहर जाती है। आज कला का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। लोककला को अपनाकर कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में आगे बढ़ सकता है। इस अवसर पर विश्वविद्यालय के एनएसएस कोषांग द्वारा दरभंगा में आयोजित सात दिवसीय युवा आपदा मित्र आवासीय प्रशिक्षण में शामिल हुए कॉलेज के 32 छात्र-छात्राओं को अतिथियों द्वारा मेडल एवं प्रमाण पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। संगोष्ठी का समापन राष्ट्रगान से हुआ।
Author: Darpan 24 News











