
दरभंगा (डॉ. संजय कुमार सहनी):_आंगनवाड़ी केंद्र की स्थापना, ICDS योजना के तहत केवल बच्चों तक पोषाहार पहुंचाने के लिए नहीं, बल्कि नौनिहालों के स्वस्थ, स्वाभाविक और समग्र विकास की आधारशिला तैयार करने के उद्देश्य से की गई थी। इस व्यवस्था के माध्यम से सरकार का मूल प्रयास यह रहा है कि प्रारंभिक बाल्यावस्था में बच्चों को पोषण, स्वास्थ्य, देखभाल के साथ साथ प्रारंभिक शिक्षा तथा विकास के लिए आवश्यक वातावरण उपलब्ध हो, ताकि वे जीवन की आगे की यात्रा के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत आधार प्राप्त कर सकें। लेकिन बिहार के विभिन्न हिस्सों से आंगनवाड़ी केंद्रों के संचालन को लेकर सामने आ रही शिकायतें यह गंभीर सवाल खड़ा करती हैं कि कहीं यह महत्वपूर्ण योजना अपने मूल आत्मीय भाव और निर्धारित उद्देश्य से धीरे-धीरे भटकती तो नहीं जा रही है।

यदि किसी आंगनवाड़ी केंद्र पर बच्चों की नियमित उपस्थिति, पोषाहार वितरण, प्रारंभिक शिक्षा, स्वच्छ एवं सुरक्षित वातावरण और देखभाल जैसी मूलभूत व्यवस्थाएं प्रभावी ढंग से संचालित नहीं हो रही हैं, तो इसका प्रभाव केवल सरकारी योजना की कार्यप्रणाली तक सीमित नहीं रहता। इसका सीधा संबंध उन नौनिहालों के भविष्य से है, जिनके विकास के सबसे संवेदनशील दौर में राज्य से अपेक्षा की जाती है कि वह उन्हें आवश्यक पोषण और देखभाल उपलब्ध कराए। दूसरी ओर, यदि किसी केंद्र के नाम पर भवन किराया, पोषाहार, मानदेय अथवा अन्य मदों में सार्वजनिक धन व्यय हो रहा हो, लेकिन अपेक्षित सेवाएं जमीन पर पूरी तरह उपलब्ध न हों, तो यह सरकारी संसाधनों के प्रभावी उपयोग और संभावित राजस्व-हानि के प्रश्न को भी जन्म देता है। हालांकि ऐसी स्थिति की वास्तविकता का निर्धारण केवल निष्पक्ष जांच और अभिलेखीय तथा भौतिक सत्यापन के आधार पर ही किया जा सकता है।
बिहार के विभिन्न जिलों में संचालित आंगनवाड़ी केंद्रों की कार्यप्रणाली को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। अभिभावकों एवं स्थानीय नागरिकों द्वारा पोषाहार वितरण, बच्चों की उपस्थिति, प्रारंभिक शिक्षा और केंद्र संचालन में अनियमितताओं की शिकायतें सामने आने के बाद राज्यव्यापी विभागीय चिंतन की आवश्यकता महसूस होने लगी है।
ग्रामीण क्षेत्रों से प्राप्त शिकायतों के अनुसार कई आंगनवाड़ी केंद्रों में बच्चों को मिलने वाले पोषाहार के वितरण में पारदर्शिता का अभाव होने का आरोप लगाया जा रहा है। कुछ स्थानों पर लाभार्थियों का कहना है कि बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए निर्धारित खाद्य सामग्री का वितरण नियमित रूप से नहीं किया जाता। वहीं कई केंद्रों में वास्तविक उपस्थिति और अभिलेखों में दर्ज उपस्थिति के बीच अंतर होने की शिकायतें भी सामने आई हैं।
बहादुरपुर के स्थानीय निवासी डॉ. संजय कुमार सहनी का कहना है कि कुछ केंद्र ऐसे भवनों या कमरों में संचालित हो रहे हैं, जहां बच्चों के बैठने और उनकी आवश्यक देखभाल के लिए पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। उनका आरोप है कि कुछ स्थानों पर सेविका द्वारा बच्चों को पढ़ाने, उनकी देखभाल करने तथा केंद्र की गतिविधियों को निर्धारित समय के अनुरूप संचालित करने की व्यवस्था भी संतोषजनक नहीं दिखाई देती। उन्होंने कहा कि यदि निरीक्षण व्यवस्था केवल औपचारिकता तक सीमित रह जाए तो ऐसी कमियों का समय रहते पता लगाना कठिन हो जाता है।
कई केंद्रों के अत्यंत सीमित अथवा तंग स्थानों में संचालित होते देखा जा सकता है।ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या संबंधित केंद्रों का नियमित भौतिक निरीक्षण वास्तव में हो रहा है। जबकि सरकार की ओर से केंद्र संचालन तथा भवन किराया आदि मदों में सार्वजनिक धन उपलब्ध कराया जाता है, इसलिए भवन के चयन, उसकी उपयुक्तता, वास्तविक उपयोग और केंद्र के नियमित संचालन का सत्यापन महत्वपूर्ण हो जाता है।
वहीं कुछ स्थानीय अभिभावकों ने आरोप लगाया है कि कई जगहों पर केंद्र संचालन में सेविका के परिजनों का हस्तक्षेप देखा जाता है तथा शिकायत करने पर लोगों को असहज स्थिति का सामना करना पड़ता है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच आवश्यक है। इस तरह की लगातार सामने आ रही शिकायतें निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी स्तर पर अनियमितता होती है तो केवल स्थानीय स्तर पर कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि संपूर्ण निगरानी तंत्र की समीक्षा आवश्यक हो जाती है। विशेष रूप से यह देखना जरूरी है कि केंद्रों की उपस्थिति, पोषाहार वितरण, आधारभूत सुविधाओं, अभिलेखों और वास्तविक लाभार्थियों के बीच कितना सामंजस्य है।
वर्ष 2025 में संसद में प्रस्तुत जानकारी के अनुसार बिहार के 1,295 आंगनवाड़ी केंद्र ऐसे पाए गए जो जून 2025 में 20 प्रतिशत से भी कम कार्य दिवसों में संचालित हुए। इस तथ्य ने राज्य में आंगनवाड़ी केंद्रों की नियमितता और निगरानी व्यवस्था को लेकर नई बहस को जन्म दिया है।
सरकार द्वारा पोषण ट्रैकर, डिजिटल उपस्थिति, आधार आधारित सत्यापन और ऑनलाइन मॉनिटरिंग जैसी व्यवस्थाएं लागू की गई हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इनकी प्रभावशीलता को लेकर सवाल बने हुए हैं। आवश्यकता इस बात की है कि डिजिटल रिकॉर्ड और जमीनी वास्तविकता के बीच भी नियमित मिलान किया जाए, ताकि कागज पर संचालित व्यवस्था और वास्तविक केंद्र संचालन में अंतर की संभावना कम हो।
ए.एन.डी. कॉलेज, पटोरी के मनोविज्ञान विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. अमरजीत भारती ने कहा कि प्रारंभिक बाल्यावस्था बच्चों के विकास की सबसे महत्वपूर्ण अवस्था होती है। उनके अनुसार, आंगनवाड़ी केंद्र केवल पोषाहार वितरण का माध्यम नहीं हैं, बल्कि बच्चों के शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास की आधारशिला हैं। यदि केंद्र प्रभावी रूप से संचालित नहीं होते हैं तो इसका असर बच्चों के पोषण स्तर, स्वास्थ्य और प्रारंभिक शिक्षा पर पड़ सकता है।
सामाजिक कार्यकर्ता सह सदस्य, बाल कल्याण समिति, दरभंगा के अजीत कुमार मिश्रा एवं अभिभावकों ने राज्य सरकार से मांग की है कि सभी आंगनवाड़ी केंद्रों का विशेष ऑडिट कराया जाए, पोषाहार वितरण की स्वतंत्र जांच कराई जाए तथा प्रत्येक केंद्र का भौतिक सत्यापन सुनिश्चित किया जाए। साथ ही सामाजिक अंकेक्षण, डिजिटल उपस्थिति और शिकायत निवारण व्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाने की मांग की गई है।
मामला केवल किसी एक केंद्र या किसी एक जिले की कार्यप्रणाली का नहीं है। आंगनवाड़ी व्यवस्था उन बच्चों से जुड़ी है, जो अभी अपने अधिकारों के लिए स्वयं आवाज उठाने की स्थिति में भी नहीं हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि योजना की मूल भावना—नौनिहालों का स्वस्थ, सुरक्षित, स्वाभाविक और समग्र विकास—को केंद्र में रखकर पूरी व्यवस्था की समीक्षा की जाए। यदि कहीं सार्वजनिक धन का उपयोग हो रहा है तो उसके अनुरूप सेवा का वास्तविक लाभ बच्चों तक पहुंचना भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
अब देखना यह होगा कि राज्य सरकार और समाज कल्याण विभाग इन शिकायतों को कितनी गंभीरता से लेते हैं और बच्चों के पोषण, प्रारंभिक शिक्षा एवं अधिकारों से जुड़े इस महत्वपूर्ण विषय पर क्या ठोस कदम उठाते हैं।
Author: Darpan 24 News











