
दरभंगा_(डॉ संजय कुमार सहनी), आज बिहार सहित पूरे देश में एक चिंताजनक दृश्य आम हो गया है। सुबह मजदूर, रिक्शाचालक, किसान और आम नागरिक सड़क किनारे प्लास्टिक के कप में गर्म चाय पीते हैं। दोपहर का भोजन प्लास्टिक की थैली या डिब्बे में पैक होकर घर पहुंचता है। शाम को फिर वही क्रम दोहराया जाता है। यह केवल एक आदत नहीं, बल्कि धीरे-धीरे हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन चुकी जीवनशैली है।

विडंबना यह है कि जिन लोगों को सबसे अधिक स्वास्थ्य सुरक्षा की आवश्यकता है, वही लोग आर्थिक मजबूरी और जागरूकता के अभाव में सबसे अधिक प्लास्टिक के संपर्क में रहते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि गर्म चाय या भोजन जब निम्न गुणवत्ता वाले प्लास्टिक के कप या कंटेनर में रखा जाता है, तो कुछ रसायन और प्लास्टिक के कण भोजन में मिल जाते हैं। कुछ प्लास्टिक में Bisphenol-A (BPA) और Phthalates जैसे रसायन पाए जाते हैं, जो हार्मोनल असंतुलन, प्रजनन संबंधी समस्याओं और कुछ प्रकार के कैंसर के जोखिम से जुड़े पाए गए हैं।
शोधों में यह भी पाया गया है कि गर्म पेय पदार्थों के संपर्क में आने पर प्लास्टिक से सूक्ष्म कण (Microplastics) निकल सकते हैं, जो शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। इन पर अभी भी व्यापक शोध जारी है, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञ इनके अत्यधिक संपर्क से बचने की सलाह देते हैं। हालांकि कैंसर जैसी घातक बीमारी के लिए केवल प्लास्टिक ही नहीं, हमारी पूरी जीवनशैली जिम्मेदार है। कैंसर किसी एक कारण से नहीं होता। इसके पीछे कई कारण मिलकर काम करते हैं—
तंबाकू, गुटखा और पान मसाला, धूम्रपान और शराब, प्लास्टिक में गर्म भोजन और पेय का सेवन, मिलावटी एवं अत्यधिक प्रसंस्कृत (Processed) भोजन, कीटनाशकों से प्रभावित फल और सब्जियां, वायु प्रदूषण, शारीरिक श्रम कम होना, मोटापा, देर रात तक जागना और तनावपूर्ण जीवन, नियमित स्वास्थ्य जांच नहीं कराना।
बिहार के छोटे कस्बों और गांवों में आज भी अधिकांश चाय की दुकानों पर डिस्पोजेबल प्लास्टिक कप का उपयोग होता है। होटलों में गर्म दाल, सब्जी और चावल प्लास्टिक की थैलियों या कंटेनरों में पैक किए जाते हैं। कई लोग इन्हीं प्लास्टिक के डिब्बों का बार-बार उपयोग भी करते हैं, जबकि वे केवल एक बार उपयोग के लिए बने होते हैं। यह सुविधा आज सस्ती लगती है, लेकिन भविष्य में यही आदत महंगा इलाज और असमय मृत्यु का कारण बन सकती।
भारत में हर वर्ष लगभग 15 लाख नए कैंसर रोगियों का अनुमान लगाया जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में लगभग 30–50% कैंसर मामलों को स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर रोका जा सकता है। प्लास्टिक प्रदूषण और माइक्रोप्लास्टिक के स्वास्थ्य प्रभावों पर दुनिया भर में तेजी से शोध हो रहा है और स्वास्थ्य एजेंसियां अनावश्यक प्लास्टिक संपर्क कम करने की सलाह देती हैं।
यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन तीन बार प्लास्टिक के कप में गर्म चाय पीता है, दो बार प्लास्टिक के डिब्बे में पैक भोजन खाता है और वर्षों तक यही क्रम चलता रहता है, तो वह अनजाने में अपने शरीर को लगातार ऐसे रसायनों और सूक्ष्म प्लास्टिक कणों के संपर्क में रख सकता है। यह अकेला कारण नहीं, लेकिन अन्य जोखिम कारकों के साथ मिलकर बीमारी की संभावना बढ़ा सकता है।
क्या करें?
गर्म चाय कुल्हड़, कांच या स्टीलके बर्तन में पिएं। गर्म भोजन प्लास्टिक में पैक कराने से बचें। घर में स्टील, कांच या मिट्टी के बर्तनों का उपयोग बढ़ाएं। तंबाकू और धूम्रपान पूरी तरह छोड़ें। नियमित व्यायाम करें। ताजे फल और हरी सब्जियां खाएं।

किसी भी असामान्य गांठ, लगातार घाव, खून आना या अचानक वजन घटने जैसे लक्षणों को नजरअंदाज न करें। समय-समय पर स्वास्थ्य जांच कराएं
कैंसर अचानक नहीं होता; यह वर्षों तक हमारी छोटी-छोटी गलत आदतों का परिणाम भी हो सकता है। प्लास्टिक का अनावश्यक उपयोग, तंबाकू, प्रदूषण, मिलावटी भोजन और अस्वस्थ जीवनशैली—ये सभी मिलकर जोखिम बढ़ाते हैं। यदि हम आज अपनी आदतें बदल लें, तो आने वाली पीढ़ियों को एक स्वस्थ भविष्य दे सकते हैं।
“सुविधा के नाम पर अपनाई गई गलत आदतें धीरे-धीरे बीमारी का रूप ले लेती हैं। सस्ती प्लास्टिक की एक चाय आज भले सस्ती लगे, लेकिन स्वस्थ जीवन उससे कहीं अधिक मूल्यवान है।
Author: Sanjay Kumar Sahni











