
शहादत को केवल स्मृति नहीं, अध्ययन, अनुशासन, विवेक और सामाजिक जिम्मेदारी में बदलने की जरूरत

दरभंगा:- (डॉ. संजय कुमार सहनी)_28 सितम्बर 1907 को जन्मे गत सिंह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के उन असाधारण युवाओं में थे, जिन्होंने बहुत कम आयु में अपने समय की राजनीतिक परिस्थितियों को समझने, प्रश्न करने और उनके विरुद्ध संघर्ष करने का साहस दिखाया। 23 मार्च 1931 को राजगुरु और सुखदेव के साथ उनकी फाँसी ने उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष की अमर स्मृति का हिस्सा बना दिया। लेकिन भगत सिंह को केवल शहीद और क्रांतिकारी के रूप में याद करना उनके व्यक्तित्व के एक बड़े हिस्से को नजरअंदाज करना होगा। उनके लेखन, अध्ययन और वैचारिक विकास से एक ऐसे युवा का परिचय मिलता है जो अपने समय की राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था और मनुष्य की स्वतंत्रता जैसे प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करता था। उनके ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’ जैसे लेख आज भी उनके तर्क, आत्ममंथन और बौद्धिक जिज्ञासा के दस्तावेज हैं।
आज भगत सिंह की जयंती पर असली प्रश्न यह है कि क्या आज का युवा उनके जीवन से कुछ सीख भी रहा है?
आज की युवा पीढ़ी के सामने औपनिवेशिक दमनकारी परिस्थिति नहीं है। उसके सामने चुनौतियों का स्वरूप अलग है—नशा, डिजिटल व्यसन, गलत संगति, हिंसा, अपराध, बिना मेहनत किए, बिना कॉलेज, विश्वविद्यालय की कक्षा किए सफलता की मानसिकता, उपभोक्तावाद, दिखावे की उत्कट आकांक्षा , बेरोजगारी और भविष्य को लेकर तनाव। विश्व स्वास्थ्य संगठन किशोरावस्था को शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास की अत्यंत महत्वपूर्ण अवस्था मानता है और बताता है कि जोखिमपूर्ण व्यवहार, नशीले पदार्थों का उपयोग, हिंसा तथा मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएँ परस्पर जुड़ सकती हैं। परिवार, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय और समुदाय का सुरक्षित माहौल एवं सहयोगात्मक वातावरण युवाओं के विकास में सुरक्षात्मक भूमिका निभाता है।
भगत सिंह का जीवन हमारे सामने एक बुनियादी प्रश्न रखता है—युवा अपनी ऊर्जा किस दिशा में लगाए? भगत सिंह की पहली सीख—पढ़ो और प्रश्न करो।
भगत सिंह की लोकप्रिय छवि एक निर्भीक क्रांतिकारी की है, लेकिन उनके व्यक्तित्व का अध्ययनशील पक्ष उतना ही महत्वपूर्ण है। जेल में उनके द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’ उनके वैचारिक श्रेष्ठता उत्कृष्ट का प्रमाण है। उन्होंने अपने विश्वासों को केवल परंपरा या सामाजिक दबाव के आधार पर स्वीकार करने के बजाय प्रश्न और तर्क की कसौटी पर परखा। उनके उपलब्ध लेखन से उनके व्यापक अध्ययन और वैचारिक रुचियों का परिचय मिलता है।

आज सूचना का विस्फोट है, लेकिन ज्ञान का संकट भी दिखाई देता है। मोबाइल की स्क्रीन पर हजारों सूचनाएँ उपलब्ध हैं, परंतु सूचना और ज्ञान में अंतर है। इसलिए भगत सिंह से आज के विद्यार्थी की पहली सीख होनी चाहिए— पढ़ो। प्रश्न करो। प्रमाण खोजो। तर्क करो। फिर अपना विचार बनाओ और तब दूसरों को बताओ।
भगत सिंह और उनके साथियों ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध क्रांतिकारी रास्ता अपनाया। 8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केंद्रीय विधान सभा में बम फेंका और जानबूझकर गिरफ्तारी दी; उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार इस कार्रवाई को मुकदमे के माध्यम से राजनीतिक संदेश को सार्वजनिक करने की रणनीति के रूप में देखा गया। इस इतिहास को समझना आवश्यक है, लेकिन आज के युवाओं के लिए इसका अर्थ अपराध, हिंसा या कानून तोड़ने की प्रेरणा बिल्कुल गलत हो सकता।
आज का भारत एक संवैधानिक लोकतंत्र है। इसलिए वर्तमान युवा के लिए संघर्ष का अर्थ होना चाहिए—ज्ञान के लिए संघर्ष, समान अवसर के लिए संघर्ष, सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष, भ्रष्टाचार और भेदभाव के विरुद्ध लोकतांत्रिक आवाज तथा स्वयं की कमजोरियों के विरुद्ध आत्मसंघर्ष।
आज युवाओं के संदर्भ में नशे की समस्या को गंभीरता से देखने की जरूरत है। जैसे कि हम सभी जानते हैं कि किशोरावस्था में शुरू होने वाला नशीले पदार्थ का उपयोग आगे चलकर युवाओं के मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य समस्याओं के गंभीर खतरा पैदा कर सकता है। किसी समस्या से निबटने के लिए जोखिमपूर्ण व्यवहार अर्थात नशापान करना दूसरी गंभीर समस्या को जन्म दे सकता है।
इसलिए किसी नशे की गिरफ्त में आए युवा को केवल ‘चरित्रहीन’ या ‘बिगड़ा हुआ’ कह देना समस्या का समाधान नहीं है। गलत काम को गलत कहना जरूरी है, लेकिन व्यक्ति को सुधार का अवसर देना भी उतना ही जरूरी है। यह कार्ययोजना किसी सरकारी योजना के रूप में नहीं, बल्कि विद्यार्थी, परिवार, शिक्षक और समाज द्वारा अपनाए जा सकने वाले व्यवहारिक कार्यक्रम के रूप में देखी जा सकती है।
पहला सूत्र : एक वर्ष—एक लक्ष्य – हर विद्यार्थी वर्ष की शुरुआत में एक स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित करे। यह लक्ष्य प्रतियोगी परीक्षा, उच्च शिक्षा, किसी कौशल, खेल, शोध, रोजगार या व्यक्तित्व-विकास से संबंधित हो सकता है।
लक्ष्य को चार स्तरों में बाँटा जाए—
वार्षिक लक्ष्य, मासिक लक्ष्य, साप्ताहिक लक्ष्य, दैनिक कार्य।
प्रथम सूत्र: इससे ‘मुझे जीवन में कुछ करना है’ जैसी अस्पष्ट इच्छा एक वास्तविक कार्ययोजना में बदल सकती है।
दूसरा सूत्र : प्रतिदिन एक घंटा ‘ज्ञान के नाम’
प्रत्येक विद्यार्थी प्रतिदिन कम-से-कम एक घंटा गंभीर अध्ययन के लिए निर्धारित करे। आधा घंटा पाठ्यक्रम या प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी और आधा घंटा किसी अच्छी पुस्तक, जीवनी, इतिहास, विज्ञान, संविधान, साहित्य या समसामयिक विषय के अध्ययन में लगाया जा सकता है। महीने में कम-से-कम एक पुस्तक पढ़ने का लक्ष्य रखा जा सकता है। – जिस युवा की दोस्ती पुस्तकों से हो जाती है, उसके विचारों की दुनिया व्यापक होने लगती है।
तीसरा सूत्र : मोबाइल आपका साधन हो, मालिक नहीं- मोबाइल को छोड़ना आज संभव या आवश्यक नहीं, लेकिन उसके उपयोग को नियंत्रित करना आवश्यक है। विद्यार्थी स्वयं के लिए चार नियम बना सकता है—
– पढ़ाई के समय मोबाइल दूर रहेगा।
– भोजन के समय मोबाइल का उपयोग नहीं होगा।
– सोने से पहले निश्चित समय पर स्क्रीन बंद होगी।
– हर सप्ताह स्क्रीन-टाइम की समीक्षा होगी।
चौथा सूत्र : आधा घंटा शरीर के लिए- प्रतिदिन कम-से-कम 30 मिनट खेल, दौड़, योग, पैदल चलना, साइकिल या अन्य शारीरिक गतिविधि के लिए निर्धारित किया जाए।
पाँचवाँ सूत्र : संगति की साप्ताहिक समीक्षा – हर रविवार युवा स्वयं से पूछे— मेरे पाँच सबसे करीबी मित्र मुझे किस दिशा में ले जा रहे हैं? क्या वे पढ़ाई, खेल, कौशल और सकारात्मक गतिविधियों की ओर प्रेरित करते हैं या नशे, जुए, हिंसा, अपराध और निरर्थक समय-व्यय की ओर? यदि आपको लगता है कि हमारे मित्र मुझे गलत संगति में ले जा रहे हैं तो अविलंब उससे दूरी बना लें, यह युवाओं की कमजोरी नहीं, आत्मरक्षा होगी।
लेकिन यदि कोई मित्र स्वयं भटक रहा है तो उसे अपमानित करने के बजाय सम्मानपूर्वक समझाना, किसी शिक्षक या परिवारजन से बात करना और जरूरत पड़ने पर पेशेवर सहायता दिलाना अत्यंत आवश्यक होता है।
छठा सूत्र : सप्ताह में एक घंटा समाज के नाम। हर युवा सप्ताह में कम-से-कम एक घंटे की सामाजिक सेवा करे। जैसे_ किसी गरीब बच्चे को पढ़ाना, पुस्तकालय में सहयोग करना, पौधारोपण, स्वच्छता अभियान, वृद्ध व्यक्ति की सहायता, रक्तदान संबंधी जागरूकता अथवा स्थानीय सामाजिक समस्या पर काम—ऐसी गतिविधियाँ युवा को ‘मैं’ से ‘हम’ की ओर ले जाती हैं। वास्तव में यही सामाजिक जिम्मेदारी लोकतांत्रिक नागरिकता का आधार बन सकती है।
सातवाँ सूत्र : प्रतिदिन दस मिनट आत्ममंथन- रात को सोने से पहले केवल दस मिनट स्वयं के लिए। तीन प्रश्न— खुद से करें। आज मैंने क्या सीखा? आज मैंने क्या गलत किया? कल मुझे क्या सुधारना है? यह छोटा अभ्यास धीरे-धीरे आत्म-अनुशासन को आदत में बदल सकता है।
आठवाँ सूत्र : नशे की स्थिति में अकेले संघर्ष नहीं करना है। यदि कोई युवा पहले से नशे की गिरफ्त में है और स्वयं उसे छोड़ने में कठिनाई महसूस कर रहा है, तो इसे केवल इच्छाशक्ति की कमी न माना जाए। परिवार, शिक्षक, चिकित्सक, मनोवैज्ञानिक या प्रशिक्षित नशामुक्ति सेवा की सहायता ली जाए। मदद माँगना कमजोरी नहीं, सुधार की शुरुआत है।
यदि युवाओं को बदलना है तो केवल युवाओं से अपेक्षा करना पर्याप्त नहीं होगा। विद्यालय और महाविद्यालयों को भी ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जहाँ विद्यार्थी अपनी समस्याओं पर खुलकर बात कर सकें। छात्रों को अपनी बात रखने का कैंपस में उचित माहौल, मंच प्रदान किया जाना चाहिए।
प्रत्येक महाविद्यालय में महीने में कम से कम एक बार ‘युवा संवाद दिवस’ या ‘युवा संवाद कार्यक्रम’ आयोजित किया जाना चाहिए।
इसमें पाँच विषय अनिवार्य हों—
पुस्तक-पठन, नशामुक्ति, मानसिक स्वास्थ्य, डिजिटल अनुशासन और करियर।
इसके साथ खेल, वाद-विवाद, निबंध, पुस्तक समीक्षा और सामाजिक सेवा की गतिविधियाँ हों। इस तरह भगत सिंह की जयंती केवल एक दिन का समारोह यह इतिहास की पाठ्य पुस्तक में एक महान क्रांतिकारी शहीद न रहकर पूरे वर्ष चलने वाली युवाओं के चरित्र-निर्माण की प्रक्रिया बन सकती है।
युवाओं के भटकाव के लिए केवल युवा को दोष देना उचित नहीं होगा। परिवार को यह समझना होगा कि हर गलती का उत्तर डाँट नहीं है। यदि बच्चे के व्यवहार में अचानक परिवर्तन आए, पढ़ाई से दूरी बढ़े, मित्र-मंडली बदल जाए, अत्यधिक अकेलापन दिखाई दे या नशे के संकेत मिलें तो पहला प्रश्न यह होना चाहिए—
“तुम्हारे साथ क्या हो रहा है?”
न कि— “तुम इतने खराब क्यों हो गए?” भटके हुए युवा को वापस लाना भी परिवार और समाज की जिम्मेदारी है। किसी युवा की एक गलती उसके पूरे भविष्य का अंतिम निर्णय नहीं हो सकती।
अपराध को अपराध कहना आवश्यक है। कानून का पालन आवश्यक है। लेकिन अपराध की ओर बढ़ रहे युवा के लिए समय रहते शिक्षा, परामर्श, कौशल, रोजगार और सकारात्मक सामाजिक जुड़ाव के रास्ते उपलब्ध कराना भी समाज की जिम्मेदारी है।
सुधार की संभावना समाप्त कर देना आसान है; किसी युवा के जीवन को सुधार की दिशा देना निश्चित ही कठिन हैं, लेकिन अधिक मानवीय काम है।
यही कारण है कि युवाओं के लिए जब नीति बने तो वह नीति केवल रोजगार या परीक्षा तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उसमें मानसिक स्वास्थ्य, नशामुक्ति, खेल, पुस्तकालय, कौशल, डिजिटल साक्षरता, परामर्श और सामाजिक सहभागिता भी शामिल होनी चाहिए।
भगत सिंह ने जिस समय अपने जीवन का सर्वोत्तम हिस्सा देश के प्रश्नों को समझने और उनके लिए संघर्ष करने में लगाया, आज का युवा अपने सामने उपलब्ध स्वतंत्रता और संसाधनों का उपयोग किस प्रकार करता है—यह हमारे समय का बड़ा यक्ष प्रश्न है।
आज हमें ऐसे युवा चाहिए जो—
नशे के नहीं, ज्ञान के साथी हों।
अपराध के नहीं, जिम्मेदारी के साथी हों।
अंधानुकरण के नहीं, तर्क के साथी हों।
निराशा के नहीं, आशावादी लक्ष्य के साथी हों। हिंसा के नहीं, लोकतांत्रिक चेतना के वाहक हों। केवल नौकरी खोजने वाले नहीं, ज्ञान और कौशल पैदा करने वाले नागरिक हों।
भगत सिंह की शहादत सही मायनों में तब सार्थक होगी जब कोई विद्यार्थी नशे से बाहर निकलकर पुस्तक उठाए, कोई युवा अपराध की राह छोड़कर कौशल और रोजगार की ओर बढ़े, कोई निराश विद्यार्थी अपने शिक्षक से संवाद करे, कोई अभिभावक अपने बच्चे को डाँटने के बजाय उसकी सुने और कोई शिक्षक केवल अंक देने के बजाय अपने विद्यार्थी को जीवन की दिशा देने का प्रयास करे।
क्योंकि अंततः किसी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति उसके संसाधन नहीं, उसके जागरूक, विवेकशील, अनुशासित और जिम्मेदार युवा होते हैं और इसलिए भगत सिंह की जयंती पर आज का सबसे बड़ा संकल्प यही होना चाहिए—

“मैं अपने समय को व्यर्थ नहीं जाने दूँगा।
मैं अपनी ऊर्जा को नशे, अपराध और अराजकता में नहीं, ज्ञान, कौशल, चरित्र और समाज के निर्माण में लगाऊँगा।”
यही उनके लिए सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
Author: Sanjay Kumar Sahni











