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पेरियार की वैचारिक विरासत आज भी सामाजिक समानता और तार्किक चेतन राह दिखाती है : डॉ. संजय कुमार सहनी

दरभंगा:_ पेरियार की वैचारिक विरासत आज भी सामाजिक समानता और तार्किक चेतन राह दिखाती है : डॉ. संजय कुमार सहनी सुधारक, चिंतक, लेखक, पत्रकार एवं आत्मसम्मान आंदोलन के प्रणेता ई. वी. रामासामी ‘पेरियार’ की जयंती पर इतिहास विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. संजय कुमार सहनी ने कहा कि पेरियार को केवल एक राजनीतिक व्यक्तित्व के रूप में देखना उनके व्यापक सामाजिक एवं वैचारिक योगदान को सीमित कर देना होगा। वे बीसवीं सदी के उन प्रमुख सामाजिक चिंतकों में थे जिन्होंने जाति-आधारित असमानता, सामाजिक पदानुक्रम, लैंगिक भेदभाव, रूढ़िवाद और अंधविश्वास के विरुद्ध प्रश्न उठाए तथा आत्मसम्मान, सामाजिक समानता और तार्किक चेतना को सामाजिक परिवर्तन के महत्वपूर्ण आधारों के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया।

डॉ. सहनी ने कहा कि 17 सितंबर 1879 को ई. वी. रामासामी का जन्म तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी के ईरोड में हुआ था। उनका सार्वजनिक जीवन उस समय विकसित हुआ जब दक्षिण भारत में सामाजिक असमानता, जातिगत पदानुक्रम और गैर-ब्राह्मण सामाजिक-राजनीतिक चेतना के प्रश्न प्रमुखता से उभर रहे थे। पेरियार ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में भी सक्रिय भागीदारी की। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े और बाद में सामाजिक प्रतिनिधित्व और जातिगत असमानता के प्रश्नों को लेकर कांग्रेस से उनके गंभीर मतभेद हुए और उन्होंने स्वतंत्र सामाजिक आंदोलन का मार्ग अपनाया।

डॉ. सहनी ने कहा कि 1925 में प्रारंभ आत्मसम्मान आंदोलन पेरियार के सामाजिक चिंतन का केंद्रीय अध्याय था। इसका मूल आग्रह था कि किसी व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा उसकी जन्म-आधारित जाति या वंशगत स्थिति से निर्धारित नहीं होनी चाहिए। आत्मसम्मान उनके लिए केवल व्यक्तिगत स्वाभिमान नहीं, बल्कि ऐसी सामाजिक व्यवस्था की स्थापना का प्रश्न था जिसमें प्रत्येक मनुष्य को समान मानवीय गरिमा प्राप्त हो।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में भी शिक्षा, रोजगार, सामाजिक प्रतिष्ठा और सार्वजनिक अवसरों में समान भागीदारी का प्रश्न महत्वपूर्ण है। इसलिए पेरियार के आत्मसम्मान के विचार को आज समान अवसर, सामाजिक न्याय और गरिमापूर्ण जीवन के व्यापक संदर्भ में समझा जा सकता है।

डॉ. सहनी ने कहा कि पेरियार की ऐतिहासिक विरासत का महत्वपूर्ण पक्ष उनकी जाति व्यवस्था की तीखी आलोचना है। उन्होंने जाति को केवल सामाजिक पहचान के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक पदानुक्रम और असमानता की संरचना के रूप में देखा। सामाजिक समानता के प्रश्न पर उनके विचारों को समझने के लिए वैकोम सत्याग्रह (1924–25) भी महत्वपूर्ण है, जिसमें उन्होंने मंदिर के आसपास की सार्वजनिक सड़कों पर वंचित जातियों के आवागमन के अधिकार के संघर्ष में सक्रिय भूमिका निभाई।

उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान ने समानता, स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय को लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल मूल्यों के रूप में स्थापित किया है। इसके बावजूद सामाजिक भेदभाव और अवसरों की असमानता से जुड़े प्रश्न आज भी सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा हैं। इस संदर्भ में पेरियार के जाति-विरोधी विचारों का ऐतिहासिक अध्ययन सामाजिक न्याय की अवधारणा के विकास को समझने में उपयोगी है।

डॉ. सहनी ने कहा कि पेरियार के विचारों का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष तर्कवाद और विवेकशीलता था। वे सामाजिक मान्यताओं और परंपराओं को केवल इसलिए स्वीकार करने के पक्ष में नहीं थे कि वे पुरानी या प्रचलित हैं। वे प्रश्न करने, तर्क करने और प्रमाण के आधार पर निष्कर्ष तक पहुँचने पर बल देते थे।

उन्होंने कहा कि यह विचार आज के डिजिटल और सूचना-प्रौद्योगिकी के युग में विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो गया है। सोशल मीडिया के माध्यम से सूचनाएँ कुछ ही क्षणों में व्यापक स्तर पर पहुँच जाती हैं। इनके साथ अपुष्ट दावे, अफवाहें और अंधविश्वास भी तेजी से प्रसारित हो सकते हैं। ऐसी परिस्थिति में तथ्य-जाँच, प्रमाण, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आलोचनात्मक चिंतन की आवश्यकता पहले से अधिक हो गई। पेरियार का तर्कवाद आज यह बुनियादी प्रश्न सामने रखता है कि किसी विचार को केवल उसके प्रचलित होने के कारण स्वीकार किया जाए या उसे प्रमाण और तर्क की कसौटी पर भी परखा जाए।

डॉ. सहनी ने कहा कि पेरियार के सामाजिक चिंतन में महिलाओं की स्वतंत्रता और समानता का महत्वपूर्ण स्थान था। उन्होंने कहा कि आज महिलाओं की शिक्षा, रोजगार, संपत्ति के अधिकार, सार्वजनिक जीवन में भागीदारी और निर्णय लेने की स्वतंत्रता पर निरंतर विमर्श हो रहा है। इसलिए पेरियार के स्त्री-विमर्श का अध्ययन आधुनिक भारत में लैंगिक समानता के ऐतिहासिक विकास को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।

डॉ. सहनी ने कहा कि पेरियार केवल सामाजिक आंदोलनकारी नहीं थे, बल्कि लेखक, संपादक और पत्रकार भी थे। उनकी पत्रिका ‘कुडियारसु’ सामाजिक और राजनीतिक प्रश्नों पर वैचारिक बहस का महत्वपूर्ण मंच बनी। उनकी पत्रकारिता से स्पष्ट होता है कि सामाजिक परिवर्तन केवल राजनीतिक आंदोलनों के माध्यम से नहीं, बल्कि विचार, लेखन, संवाद और सार्वजनिक बहस के माध्यम से भी निर्मित होता है। उन्होंने कहा कि आज सार्वजनिक विमर्श का बड़ा हिस्सा डिजिटल माध्यमों पर हो रहा है। ऐसे समय में जिम्मेदार पत्रकारिता, तथ्य-जाँच, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और तर्कपूर्ण असहमति का महत्व और बढ़ जाता है। इस दृष्टि से पेरियार की पत्रकारिता का अध्ययन वर्तमान मीडिया संस्कृति को समझने के लिए भी उपयोगी है।

डॉ. सहनी ने कहा कि पेरियार के वैचारिक संसार को समझने के लिए भगत सिंह से जुड़ा प्रसंग भी उल्लेखनीय है। 1931 में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की फाँसी के बाद पेरियार ने अपने पत्र ‘कुडियारसु’ में भगत सिंह और उनके विचारों पर लिखा। भगत सिंह के प्रसिद्ध लेख ‘मैंनास्तिकक्योंहूं’ के तमिल अनुवाद को भी पेरियार के प्रकाशन-संसार में स्थान मिला।

उन्होंने कहा कि यह प्रसंग औपनिवेशिक भारत में विचारों के भाषाई आदान-प्रदान, अनुवाद और पत्रकारिता की भूमिका को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। डॉ. सहनी ने कहा कि 1944 में जस्टिस पार्टी का नाम बदलकर द्रविड़ कड़गम किए जाने के बाद पेरियार के नेतृत्व में द्रविड़ आंदोलन को अधिक संगठित वैचारिक स्वरूप मिला। उन्होंने कहा कि पेरियार की विरासत का अध्ययन करते समय उनके विचारों को उनके ऐतिहासिक संदर्भ में समझना आवश्यक है। धर्म, भाषा, राष्ट्रवाद और द्रविड़ पहचान से जुड़े उनके विचारों पर विभिन्न स्तरों पर बहस और आलोचना हुई है। इतिहासकार का दायित्व किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व को केवल महिमामंडित या खारिज करना नहीं, बल्कि उसके विचारों, कार्यों, उपलब्धियों और विवादों का स्रोतों के आधार पर आलोचनात्मक अध्ययन करना है।

डॉ. सहनी ने कहा कि आज की युवा पीढ़ी के सामने यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि सामाजिक पहचान, जन्म और परंपरा व्यक्ति के अवसरों एवं सम्मान को किस सीमा तक निर्धारित करें और आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों की भूमिका क्या हो।

उन्होंने स्पष्ट किया कि पेरियार की प्रासंगिकता का अर्थ उनके प्रत्येक विचार को वर्तमान में यथावत स्वीकार करना नहीं है। इतिहास का उद्देश्य अतीत के व्यक्तित्वों की पूजा करना नहीं, बल्कि उनके विचारों और कर्मों को उनके समय की परिस्थितियों में समझना, उनकी उपलब्धियों और सीमाओं का विश्लेषण करना तथा उनसे वर्तमान के लिए प्रश्न ग्रहण करना है।

डॉ. सहनी ने कहा कि 17 सितंबर को पेरियार की जयंती के अवसर पर सामाजिक न्याय, आत्मसम्मान और तार्किक चेतना जैसे मूल्यों पर विमर्श उनके ऐतिहासिक योगदान को वर्तमान संदर्भ से जोड़ने का अवसर प्रदान करता है। पेरियार की विरासत हमें यह विचार करने के लिए प्रेरित करती है कि लोकतंत्र केवल राजनीतिक अधिकारों की व्यवस्था नहीं, बल्कि सामाजिक सम्मान, समान अवसर, स्वतंत्र चिंतन और मानवीय गरिमा से भी जुड़ा हुआ है।

उन्होंने कहा, “पेरियार को याद करने का सबसे सार्थक तरीका केवल उनकी तस्वीर पर माल्यार्पण करना नहीं, बल्कि उन सामाजिक प्रश्नों को समझना है जिन्हें उन्होंने एक सदी पहले सार्वजनिक बहस के केंद्र में लाने का प्रयास किया था—मनुष्य की गरिमा, समानता, सामाजिक न्याय, महिलाओं की स्वतंत्रता और तर्कपूर्ण चेतना। आज की बदलती दुनिया में इन प्रश्नों पर गंभीर, तथ्याधारित और आलोचनात्मक संवाद लोकतांत्रिक समाज के लिए अत्यंत आवश्यक है।”

डॉ. संजय कुमार सहनी ने पेरियार की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि इतिहास हमें केवल अतीत की घटनाओं को याद करना नहीं सिखाता, बल्कि अतीत के अनुभवों के माध्यम से वर्तमान को समझने और भविष्य के समाज के स्वरूप पर विचार करने की दृष्टि भी प्रदान करता है।

लेखक

डॉ. संजय कुमार सहनी
सहायक प्राध्यापक, इतिहास विभाग
सब डिविजनल गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज, बेनीपुर, दरभंगा, बिहार

Darpan 24 News
Author: Darpan 24 News


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