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विश्वकर्मा पूजा : भारतीय संस्कृति में श्रम, शिल्प और सृजन की ऐतिहासिक परंपरा

17 सितंबर का पर्व केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की निर्माणकारी चेतना और कर्म-संस्कृति का प्रतीक।

 

दरभंगा:_ 17 सितंबर को मनाया जाने वाला विश्वकर्मा पूजा पर्व भारतीय संस्कृति में श्रम, शिल्प, तकनीकी कौशल और सृजनशीलता के प्रति सम्मान की एक दीर्घ ऐतिहासिक परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। भगवान विश्वकर्मा को भारतीय धार्मिक परंपरा में देवशिल्पी, वास्तुकार और निर्माण-कौशल के अधिष्ठाता के रूप में स्मरण किया जाता है। आधुनिक समय में यह पर्व केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि कारखानों, कार्यशालाओं, निर्माण स्थलों, दुकानों और तकनीकी संस्थानों में कार्य करने वाले श्रमिकों, कारीगरों, अभियंताओं एवं शिल्पकारों के लिए अपने श्रम और उपकरणों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का अवसर बन चुका है। 2026 में विश्वकर्मा पूजा 17 सितंबर को मनाई जाएगी और इसका संबंध सूर्य के कन्या राशि में प्रवेश अर्थात् कन्या संक्रांति से है।

 

इतिहास की दृष्टि से विश्वकर्मा की अवधारणा को समझने के लिए सबसे पहले वैदिक साहित्य की ओर देखना आवश्यक है। ऋग्वेद के विश्वकर्मन् सूक्त (ऋग्वेद 10.81–10.82) में विश्वकर्मन् को सृष्टि के निर्माण और व्यवस्था से संबंधित एक विशिष्ट दैवी सत्ता के रूप में संबोधित किया गया है। यहां विश्वकर्मन् की अवधारणा बाद के लोकप्रिय ‘देवशिल्पी’ स्वरूप से कुछ भिन्न और अधिक व्यापक है। इससे यह संकेत मिलता है कि भारतीय बौद्धिक परंपरा में सृष्टि, निर्माण और रचनात्मक कर्म को अत्यंत प्राचीन काल से ही दार्शनिक एवं धार्मिक विमर्श का विषय माना गया।

 

समय के साथ विश्वकर्मा की अवधारणा का विकास हुआ और पुराणिक साहित्य में उनका स्वरूप देवताओं के शिल्पकार एवं वास्तुकार के रूप में अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। पुराणिक परंपराओं में उन्हें विभिन्न दिव्य निर्माणों, आभूषणों, अस्त्र-शस्त्रों और स्थापत्य-कृतियों से जोड़ा गया है। हालांकि इन आख्यानों को ऐतिहासिक घटनाओं के प्रत्यक्ष प्रमाण के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय धार्मिक-सांस्कृतिक स्मृति और पौराणिक परंपरा के रूप में समझना अधिक उचित है।

 

भारतीय महाकाव्य और पुराणिक आख्यानों में विश्वकर्मा को अनेक प्रसिद्ध स्थापत्य एवं शिल्प-कृतियों से जोड़ा गया है। रामायण की परंपरा में लंका तथा पुष्पक विमान और महाभारत की परंपरा में इंद्रप्रस्थ जैसे नगरों को उनकी निर्माण-कुशलता से संबद्ध किया जाता है। इसी प्रकार विभिन्न दिव्य अस्त्रों और उपकरणों के निर्माण का श्रेय भी उन्हें दिया गया है। इन कथाओं का महत्व इस बात में है कि भारतीय सांस्कृतिक कल्पना में नगर-निर्माण, वास्तुकला, धातुकर्म, शिल्प और तकनीकी दक्षता को साधारण श्रम न मानकर एक विशिष्ट सृजनात्मक शक्ति के रूप में देखा गया।

 

विश्वकर्मा पूजा का सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक पक्ष औजारों और कार्य-उपकरणों की पूजा है। इस दिन मशीनों, औजारों, वाहनों तथा कार्यस्थल की साफ-सफाई कर उनकी पूजा की जाती है। आधुनिक औद्योगिक समाज में यह परंपरा विशेष अर्थ ग्रहण करती है, क्योंकि मशीन केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि मनुष्य के ज्ञान, श्रम और तकनीकी कौशल का विस्तार भी है। औजारों को एक दिन के लिए कार्य से विराम देकर उनका सम्मान करना वस्तुतः श्रम और श्रमिक के महत्व को स्वीकार करने की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति भी है। मानवशास्त्रीय अध्ययनों में भी विश्वकर्मा पूजा को औजारों, कारीगरी, निर्माण और भौतिक संस्कृति के साथ जुड़े धार्मिक व्यवहार के रूप में देखा गया है।

 

भारतीय इतिहास में शिल्प और तकनीक की परंपरा अत्यंत प्राचीन रही है। हड़प्पा सभ्यता की नगर-योजना, जल-निकासी व्यवस्था, धातु-कर्म, मृद्भांड निर्माण और स्थापत्य-कौशल से लेकर मौर्यकालीन स्थापत्य, गुप्तकालीन कला, मध्यकालीन मंदिर स्थापत्य तथा धातु एवं वस्त्र शिल्प तक भारतीय समाज ने निर्माण-कौशल की उल्लेखनीय परंपराएं विकसित कीं। इन उपलब्धियों के पीछे केवल राजसत्ता या धार्मिक संस्थाएं नहीं थीं, बल्कि असंख्य कारीगरों, शिल्पियों, वास्तुकारों और श्रमिक समुदायों का पीढ़ियों से संचित ज्ञान और कौशल था।

 

इसी संदर्भ में विश्वकर्मा पूजा का सामाजिक महत्व और भी बढ़ जाता है। यह पर्व हमें यह स्मरण कराता है कि किसी भी सभ्यता का निर्माण केवल विचारों से नहीं होता; उसके पीछे हाथों का श्रम, तकनीकी दक्षता, औजारों का ज्ञान और सृजन की निरंतर प्रक्रिया होती है। भारतीय संस्कृति में ‘कर्म’ को जीवन के नैतिक और सामाजिक आधार से जोड़ने की जो व्यापक परंपरा है, विश्वकर्मा पूजा उसी कर्म-संस्कृति का एक विशिष्ट लोक-धार्मिक रूप भी मानी जा सकती है।

 

पूर्वी भारत, विशेषकर बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखंड और ओडिशा सहित अनेक क्षेत्रों में इस पर्व की व्यापक सामाजिक उपस्थिति दिखाई देती है। 17 सितंबर की तिथि का संबंध सामान्यतः कन्या संक्रांति से है, अर्थात् सूर्य के सिंह से कन्या राशि में प्रवेश से। यही कारण है कि यह पर्व अधिकांश चंद्र-आधारित त्योहारों की तरह हर वर्ष अलग-अलग तिथि पर न होकर लगभग निश्चित रूप से सितंबर के मध्य में आता है। 2026 में सूर्य का कन्या राशि में प्रवेश 17 सितंबर को होने के कारण इसी दिन विश्वकर्मा पूजा मनाई जा रही है।

 

आधुनिक भारत में विश्वकर्मा पूजा का अर्थ और भी व्यापक हुआ है। आज यह पर्व पारंपरिक कारीगरों से लेकर इंजीनियरों, मैकेनिकों, तकनीशियनों, निर्माणकर्मियों, औद्योगिक श्रमिकों और मशीनों के साथ कार्य करने वाले लाखों लोगों को एक साझा सांस्कृतिक सूत्र में जोड़ता है। इस दृष्टि से विश्वकर्मा पूजा परंपरा और आधुनिकता के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु का निर्माण करती है—जहां प्राचीन ‘शिल्प’ की अवधारणा आधुनिक ‘तकनीक’ और ‘इंजीनियरिंग’ के साथ संवाद करती दिखाई देती है।

 

वास्तव में विश्वकर्मा पूजा का मूल संदेश यह भी है कि हम श्रम का सम्मान करें, कौशल को प्रतिष्ठा दें, तकनीक का जिम्मेदारीपूर्ण उपयोग करें और निर्माण करने वाले हाथों को समाज में उचित सम्मान प्रदान करें। किसी भी राष्ट्र की आर्थिक और सांस्कृतिक प्रगति में उसके कुशल श्रमिकों, कारीगरों, तकनीशियनों और अभियंताओं की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी उसके विद्वानों और प्रशासकों की।

 

आज जब भारत तकनीकी विकास, औद्योगिक विस्तार, डिजिटल परिवर्तन और आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब विश्वकर्मा पूजा की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। यह पर्व हमें अपनी प्राचीन शिल्प-परंपरा से जोड़ते हुए आधुनिक वैज्ञानिक एवं तकनीकी चेतना के साथ आगे बढ़ने का संदेश देता है।

 

इस प्रकार विश्वकर्मा पूजा को केवल एक धार्मिक अनुष्ठान के रूप में देखना इसके व्यापक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अर्थ को सीमित कर देना होगा। यह भारतीय सभ्यता की निर्माणकारी चेतना, श्रम की गरिमा, तकनीकी कौशल और सृजनशीलता के प्रति सम्मान का जीवंत प्रतीक है। विश्वकर्मा की परंपरा हमें यह बोध कराती है कि सभ्यता का इतिहास केवल राजाओं और युद्धों का इतिहास नहीं होता; वह उन अनगिनत हाथों का इतिहास भी होता है, जिन्होंने नगर बनाए, औजार गढ़े, धातुओं को आकार दिया, स्थापत्य रचा और मानव जीवन को अधिक सुगम बनाने में अपना योगदान दिया।

 

लेखक:_

डॉ. संजय कुमार सहनी,सहायक प्राध्यापक,इतिहास विभाग,सब डिविजनल गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज, बेनीपुर, दरभंगा

Email – sksahni10111983@gmail.com

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Author: Darpan 24 News


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