दरभंगा : तालाबों के ऐतिहासिक नगर से जल संकट की ओर

(जल-संस्कृति की विरासत बचाना केवल अतीत का संरक्षण नहीं, आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित करने का सवाल है।)

दरभंगा;_ (डॉ संजय कुमार सहनी)_ दरभंगा की ऐतिहासिक पहचान केवल राज-दरभंगा, महलों, मंदिरों, साहित्य और सांस्कृतिक परंपराओं से निर्मित नहीं हुई है, बल्कि इसके तालाबों, पोखरों, कुओं और पारंपरिक जलस्रोतों ने भी इस नगर की सभ्यता को आकार दिया है। मिथिला की जीवन-पद्धति में जल केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन का आधार रहा है। यहां के तालाब कभी नगर की सुंदरता के प्रतीक भर नहीं थे; वे पेयजल, सिंचाई, मत्स्यपालन, भूजल पुनर्भरण, धार्मिक अनुष्ठानों और सामुदायिक जीवन के अभिन्न अंग थे। लेकिन आज प्रश्न यह है कि जिस दरभंगा की पहचान कभी तालाबों के नगर के रूप में थी, वह धीरे-धीरे जल संकट, जलजमाव और पारंपरिक जलस्रोतों के क्षरण की ओर क्यों बढ़ रहा है?

यह विडंबना ही है कि जिस शहर की ऐतिहासिक स्मृति में जल-संरक्षण की समृद्ध परंपरा रही है, उसी शहर में तालाबों का सिकुड़ना, उनका अतिक्रमण, गाद और जलकुंभी से भर जाना तथा जलनिकासी की समस्या लगातार गंभीर होती जा रही है। दरभंगा के सामने आज केवल तालाबों को बचाने का प्रश्न नहीं है, बल्कि अपनी ऐतिहासिक जल-संस्कृति और भविष्य की पर्यावरणीय सुरक्षा को बचाने की चुनौती भी है।

भारतीय इतिहास में तालाब निर्माण को केवल जल संग्रह की तकनीक के रूप में नहीं, बल्कि सामुदायिक कल्याण और स्थानीय शासन की एक महत्त्वपूर्ण व्यवस्था के रूप में देखा जाता है। प्राचीन और मध्यकालीन भारत में शासकों, सामंतों, व्यापारिक समुदायों तथा स्थानीय समाज द्वारा तालाब, कुएँ, बावड़ियाँ और जलाशय बनवाने की परंपरा विकसित हुई। मिथिला भी इस परंपरा से समृद्ध रहा है।

दरभंगा में राजपरिवार तथा स्थानीय समाज द्वारा विकसित अनेक जलाशय नगर की ऐतिहासिक संरचना का हिस्सा बने। इन जलस्रोतों ने न केवल दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति की, बल्कि धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों और सामाजिक सहभागिता को भी आधार दिया। छठ, विवाह, पर्व-त्योहार और अन्य सामुदायिक अवसरों पर तालाबों की भूमिका विशेष रही है। इस दृष्टि से तालाब दरभंगा की भौगोलिक संरचना के साथ-साथ उसकी सांस्कृतिक स्मृति के भी वाहक हैं।

पारंपरिक जल प्रबंधन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि जल को प्रकृति की साझा संपत्ति माना जाता था। तालाबों का अस्तित्व किसी एक व्यक्ति के निजी लाभ के लिए नहीं, बल्कि पूरे समुदाय की आवश्यकता और भविष्य की सुरक्षा के लिए था। आज के दौर में इसी सामुदायिक दृष्टि को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है।

दरभंगा में जलस्रोतों के क्षरण की समस्या केवल प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम नहीं है, बल्कि यह अनियोजित शहरीकरण, बढ़ती भूमि की कीमत, अतिक्रमण, कचरा प्रबंधन की विफलता और नागरिक उदासीनता का संयुक्त परिणाम है। जिस भूमि को कभी जल संचयन के लिए सुरक्षित रखा गया था, उस पर धीरे-धीरे आवासीय निर्माण, व्यावसायिक गतिविधियाँ और अन्य संरचनाएँ विकसित होने लगीं। तालाबों के प्राकृतिक आगमन एवं निकास मार्ग अवरुद्ध हुए और जलाशयों का पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ता चला गया।

दरभंगा की जल विरासत पर प्रकाशित एक महत्त्वपूर्ण शोध अध्ययन Environmental and Sustainability Indicators (जून 2025) में प्रस्तुत भू-स्थानिक विश्लेषण के अनुसार, वर्ष 1964 में शहर में लगभग 300 झीलें एवं तालाब थे, जिनकी संख्या वर्ष 2023 तक घटकर 83 रह गई। यह आँकड़ा केवल जलस्रोतों की संख्या में गिरावट नहीं दर्शाता, बल्कि शहरी विकास की उस दिशा पर भी प्रश्न खड़ा करता है, जिसमें प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व के बजाय भूमि के व्यावसायिक उपयोग को प्राथमिकता मिलती रही है।

यह संकट केवल बड़े तालाबों तक सीमित नहीं है। बहादुरपुर स्थित ऐतिहासिक धोबिया पोखर इसका एक स्थानीय उदाहरण है। लगभग चार बीघा क्षेत्र में फैला यह तालाब अतिक्रमण, मिट्टी भराई, गाद और जलकुंभी जैसी समस्याओं से जूझ रहा है। इसके आसपास की भूमि पर अवैध निर्माण की शिकायतें भी सामने आई हैं। यह स्थिति बताती है कि यदि छोटे स्थानीय जलस्रोतों की उपेक्षा होती रही तो शहर की समग्र जल-सुरक्षा कमजोर होती जाएगी।

हराही, दिग्घी और गंगासागर जैसे ऐतिहासिक जलाशयों की स्थिति भी गंभीर विमर्श का विषय बनी हुई है। इन जलस्रोतों के संरक्षण और अतिक्रमण को लेकर न्यायिक स्तर पर भी मामला पहुँचा है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण में दरभंगा के मोइन पोखर के संरक्षण से संबंधित मामला इसका उदाहरण है। मार्च 2026 में इस प्रकरण में प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने जिलाधिकारी को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का निर्देश दिया था। इससे स्पष्ट है कि तालाबों का संरक्षण अब केवल स्थानीय नागरिकों की मांग नहीं, बल्कि पर्यावरणीय न्याय और प्रशासनिक उत्तरदायित्व का प्रश्न बन चुका है।

तालाबों का महत्त्व केवल वर्षा जल संग्रह तक सीमित नहीं है। वे भूजल स्तर बनाए रखने, जैव विविधता के संरक्षण, स्थानीय तापमान नियंत्रित करने, बाढ़ के पानी को अस्थायी रूप से समाहित करने और आसपास के पर्यावरण को संतुलित रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। तालाबों में वर्षा जल का संचयन होने से भूजल पुनर्भरण की प्रक्रिया को सहायता मिलती है। इसके विपरीत, जब जलाशयों को मिट्टी से भरकर पक्के निर्माण कर दिए जाते हैं, तब वर्षा का पानी जमीन में समाहित होने के बजाय सड़कों और निचले इलाकों में जमा होने लगता है।

दरभंगा जैसे भौगोलिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र में यह समस्या और गंभीर है। केंद्रीय भूजल बोर्ड की जिला संबंधी तकनीकी रिपोर्ट में दरभंगा के कुछ हिस्सों में लंबे समय तक जलजमाव, भूजल स्तर की दीर्घकालिक गिरावट और कृत्रिम भूजल पुनर्भरण की आवश्यकता का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट में दक्षिणी हिस्सों के कुछ क्षेत्रों में भूजल में आर्सेनिक की समस्या भी दर्ज की गई है। इसलिए यह मानना उचित नहीं होगा कि केवल तालाबों की संख्या बढ़ा देने से पेयजल की गुणवत्ता की समस्या समाप्त हो जाएगी। इसके लिए जलस्रोतों का संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण और सुरक्षित पेयजल व्यवस्था साथ-साथ आवश्यक हैं।

एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि जब शहर में जलजमाव की समस्या उत्पन्न होती है, तब हम उसे केवल जलनिकासी की समस्या मानकर देखते हैं, जबकि उसके पीछे प्राकृतिक जलधारण क्षेत्रों के सिकुड़ने का भी योगदान हो सकता है। शहर के तालाबों, नालों और प्राकृतिक जलनिकासी मार्गों को एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता। ये सभी मिलकर एक प्राकृतिक जल प्रबंधन प्रणाली का निर्माण करते हैं। किसी एक कड़ी के नष्ट होने से पूरी व्यवस्था प्रभावित होती है।

आज तालाबों के संरक्षण के नाम पर कई बार सौंदर्यीकरण को ही विकास का पर्याय मान लिया जाता है। तालाब के किनारे पक्के घाट, प्रकाश व्यवस्था, बैठने के स्थान और सजावटी संरचनाएँ बनाना अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन यदि इससे तालाब का प्राकृतिक स्वरूप, जलग्रहण क्षेत्र और पारंपरिक जल प्रवाह प्रभावित होता है तो ऐसा सौंदर्यीकरण संरक्षण के मूल उद्देश्य को ही कमजोर कर सकता है।

तालाब को पार्क में बदल देना और तालाब के पारिस्थितिक तंत्र को पुनर्जीवित करना दो अलग-अलग बातें हैं। किसी जलाशय की वास्तविक सुंदरता उसके स्वच्छ जल, प्राकृतिक तटों, जलीय वनस्पतियों के संतुलन, पक्षियों की उपस्थिति और वर्षा जल को धारण करने की क्षमता में निहित होती है। विकास योजनाओं का उद्देश्य तालाब के मूल चरित्र को बचाना होना चाहिए, न कि उसे कंक्रीट के ढाँचे में बदल देना।

दरभंगा के तालाबों को बचाने के लिए सबसे पहले प्रत्येक ऐतिहासिक एवं पारंपरिक जलस्रोत का राजस्व अभिलेखों के आधार पर सीमांकन कराया जाना चाहिए। उसके वास्तविक रकबे, जलग्रहण क्षेत्र, प्राकृतिक जल प्रवेश और निकास मार्गों की पहचान कर डिजिटल मानचित्र तैयार किए जाएँ। अतिक्रमण की शिकायतों की निष्पक्ष जाँच हो और विधिसम्मत प्रक्रिया के तहत अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की जाए।

दूसरा, तालाबों की सफाई केवल जलकुंभी हटाने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। वैज्ञानिक तरीके से गाद निकालने, जल की गुणवत्ता की जाँच, घरेलू अपशिष्ट और नालों के दूषित पानी को तालाबों में जाने से रोकने तथा प्राकृतिक जल प्रवाह बहाल करने की समग्र योजना बननी चाहिए।

तीसरा, नगर निगम, जिला प्रशासन, जल संसाधन विभाग, पर्यावरण विभाग और स्थानीय निकायों के बीच समन्वित जिम्मेदारी तय हो। प्रत्येक तालाब के संरक्षण के लिए एक सार्वजनिक कार्ययोजना और समयबद्ध लक्ष्य निर्धारित किए जाएँ। कार्यों की प्रगति तथा व्यय का विवरण सार्वजनिक किया जाए, ताकि योजनाएँ केवल कागजों पर सीमित न रहें।

चौथा, विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों को तालाब संरक्षण अभियान से जोड़ा जाए। विद्यार्थियों के माध्यम से स्थानीय जलस्रोतों का ऐतिहासिक सर्वेक्षण, जल गुणवत्ता परीक्षण, पुराने राजस्व अभिलेखों का अध्ययन और पर्यावरण जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं। इतिहास, भूगोल, पर्यावरण विज्ञान और समाजशास्त्र के विद्यार्थियों के लिए यह स्थानीय स्तर पर व्यावहारिक अध्ययन का महत्त्वपूर्ण अवसर भी होगा।

पाँचवाँ, तालाबों को केवल सरकारी संपत्ति मानकर प्रशासन के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। प्रत्येक मोहल्ले में स्थानीय नागरिकों, सामाजिक संगठनों, शिक्षकों, युवाओं और जनप्रतिनिधियों की सहभागिता से तालाब संरक्षण समितियाँ गठित की जानी चाहिए। उनकी भूमिका निगरानी, स्वच्छता, जागरूकता और अतिक्रमण की सूचना देने तक स्पष्ट रूप से निर्धारित हो।

किसी भी शहर की पर्यावरणीय सुरक्षा केवल सरकारी योजनाओं से सुनिश्चित नहीं होती। इसके लिए नागरिकों की सोच और व्यवहार में भी परिवर्तन आवश्यक है। हम अपने घरों, दुकानों और सड़कों की स्वच्छता को लेकर जितने सजग हैं, उतनी ही चिंता सार्वजनिक तालाबों के प्रति भी होनी चाहिए।

तालाबों में कचरा फेंकना, पूजा सामग्री और प्लास्टिक डालना, जलाशयों के किनारे अतिक्रमण को सामान्य मान लेना और सार्वजनिक भूमि के अवैध उपयोग पर मौन रहना भी समस्या को बढ़ावा देता है। नागरिकों को यह समझना होगा कि तालाब किसी एक पीढ़ी की संपत्ति नहीं, बल्कि कई पीढ़ियों की साझा विरासत हैं।

इस संदर्भ में तालाब बचाओ अभियान में सक्रिय भूमिका निभाने वाले नारायण जी चौधरी, अजीत कुमार मिश्र, तसीम नवाब जैसे नागरिक प्रयासों का योगदान सराहनीय एवं महत्त्वपूर्ण है। दरभंगा में लंबे समय से जलस्रोतों के संरक्षण के लिए उठती आवाजें यह प्रमाणित करती हैं कि सामाजिक जागरूकता पर्यावरणीय बदलाव की एक बड़ी शक्ति बन सकती है। लेकिन इन प्रयासों को प्रशासनिक सहयोग, वैज्ञानिक विशेषज्ञता और व्यापक जनभागीदारी से जोड़ना आवश्यक है।

आज जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा के स्वरूप में अनिश्चितता, कहीं अत्यधिक वर्षा तो कहीं जल की कमी, जैसी चुनौतियाँ बढ़ रही हैं। ऐसे समय में पारंपरिक जलस्रोतों का संरक्षण भविष्य की पर्यावरणीय रणनीति का अनिवार्य हिस्सा होना चाहिए। दरभंगा के लिए यह और भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि मिथिला की भौगोलिक एवं सांस्कृतिक पहचान नदियों, तालाबों और जल आधारित आजीविका से गहराई से जुड़ी हुई है।

हमें यह भी समझना होगा कि जल संकट का समाधान केवल नए नलकूप लगाने, पाइपलाइन बिछाने या जलापूर्ति योजनाओं का विस्तार करने में नहीं है। इन सुविधाओं की अपनी उपयोगिता है, लेकिन जब तक वर्षा जल के संरक्षण, भूजल पुनर्भरण और प्राकृतिक जलस्रोतों की रक्षा को समान प्राथमिकता नहीं मिलेगी, तब तक जल सुरक्षा का आधार कमजोर बना रहेगा।

दरभंगा के तालाबों को बचाना किसी एक संस्था, व्यक्ति या सरकार का दायित्व नहीं है। यह विरासत के प्रति सम्मान, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। आज यदि हम तालाबों को बचाने में असफल होते हैं तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल जल संकट ही नहीं झेलेंगी, बल्कि उस सांस्कृतिक विरासत से भी वंचित हो जाएँगी जिसने दरभंगा को एक विशिष्ट पहचान दी है।

निष्कर्षतः कह सकते हैं कि दरभंगा को फिर से तालाबों का नगर बनाने का अर्थ अतीत की तस्वीर को दोहराना नहीं, बल्कि आधुनिक विकास को अपनी ऐतिहासिक जल-संस्कृति के अनुरूप दिशा देना है। विकास की वास्तविक कसौटी केवल ऊँची इमारतें, चौड़ी सड़कें और चमकते बाजार नहीं हो सकते। किसी शहर की प्रगति इस बात से भी मापी जानी चाहिए कि वह अपने प्राकृतिक संसाधनों को कितना सुरक्षित रखता है और आने वाली पीढ़ियों के लिए जीवन की कितनी बेहतर परिस्थितियाँ छोड़ता है।

आज दरभंगा के सामने चुनाव स्पष्ट है—एक ओर अतिक्रमण, कंक्रीट और जलस्रोतों का विनाश है, तो दूसरी ओर संरक्षण, सामुदायिक सहभागिता और सतत विकास का रास्ता। आवश्यकता है कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और नागरिक चेतना एक साथ आगे आएँ।

क्योंकि तालाब सूखते हैं तो केवल पानी नहीं सूखता, शहर की स्मृति, संस्कृति, जैव विविधता और भविष्य की सुरक्षा भी संकट में पड़ जाती है। दरभंगा को बचाना है तो उसके तालाबों को बचाना होगा।


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