राष्ट्रीय एकता दिवस : राजनीतिक एकीकरण से सामाजिक एकता तक

(सरदार वल्लभभाई पटेल की ऐतिहासिक विरासत और समकालीन भारत की चुनौतियाँ)

दरभंगा,(डॉ संजय कुमार सहनी)_भारत का राष्ट्रनिर्माण केवल स्वतंत्रता प्राप्ति की ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि राजनीतिक एकीकरण, सामाजिक परिवर्तन और संवैधानिक मूल्यों के विकास की एक सतत प्रक्रिया है। भाषाई, धार्मिक, जातीय और सांस्कृतिक विविधताओं से परिपूर्ण भारतीय समाज ने जिस साझा राष्ट्रीय पहचान का निर्माण किया है, वह विश्व इतिहास की महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक है। इस राष्ट्रीय चेतना, अखंडता और सामूहिक उत्तरदायित्व को स्मरण करने के लिए प्रत्येक वर्ष 31 अक्टूबर को राष्ट्रीय एकता दिवस मनाया जाता है। भारत सरकार ने वर्ष 2014 में सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती को आधिकारिक रूप से राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया

15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ, लेकिन स्वतंत्रता के साथ ही नवगठित राष्ट्र के सामने राजनीतिक एकीकरण की अत्यंत जटिल चुनौती उपस्थित थी। ब्रिटिश शासन की समाप्ति के समय भारतीय उपमहाद्वीप में लगभग 565 देशी रियासतें थीं। ब्रिटिश सत्ता की सर्वोच्चता समाप्त होने के बाद इन रियासतों के भविष्य का प्रश्न अनिश्चित हो गया था। यदि इनका एक साझा राजनीतिक व्यवस्था में एकीकरण नहीं होता, तो स्वतंत्र भारत की क्षेत्रीय अखंडता और राजनीतिक स्थिरता गंभीर संकट में पड़ सकती थी।

इस चुनौती का समाधान करने के लिए 5 जुलाई 1947 को रियासत विभाग (States Department) की स्थापना की गई। सरदार वल्लभभाई पटेल को इसका दायित्व सौंपा गया और वी. पी. मेनन इसके सचिव नियुक्त हुए। दोनों ने रियासतों के शासकों से संवाद, राजनीतिक समझ बूझ और कूटनीतिक प्रयासों से भारतीय संघ में सम्मिलित कराया।

इस प्रक्रिया में विलय-पत्र अर्थात् Instrument of Accession की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। इसके माध्यम से रियासतों ने रक्षा, विदेश संबंध और संचार जैसे प्रमुख विषयों पर भारतीय संघ की सत्ता स्वीकार की। यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि आधुनिक भारतीय राष्ट्र-राज्य के निर्माण की बुनियादी आवश्यकता थी।

जूनागढ़, हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर जैसी रियासतों के प्रश्न विशेष रूप से जटिल थे। जूनागढ़ के नवाब ने पाकिस्तान में विलय का निर्णय लिया, जबकि वहाँ की अधिकांश आबादी भारत में सम्मिलित होने के पक्ष में थी। फरवरी 1948 में हुए जनमत-संग्रह में भारी बहुमत ने भारत में विलय का समर्थन किया।

हैदराबाद के निजाम स्वतंत्र रहने की इच्छा रखते थे। राजनीतिक बातचीत विफल होने के बाद 13 सितंबर 1948 को भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन पोलो’ के अंतर्गत कार्रवाई शुरू की। 17 सितंबर 1948 को हैदराबाद की सेनाओं ने आत्मसमर्पण किया और रियासत का भारतीय संघ में विलय सुनिश्चित हुआ।

इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि रियासतों का एकीकरण केवल किसी एक राजनीतिक निर्णय का परिणाम नहीं था, बल्कि संवाद, कूटनीति, राजनीतिक दृढ़ता और कुछ परिस्थितियों में सैन्य कार्रवाई से जुड़ी जटिल ऐतिहासिक प्रक्रिया थी। सरदार पटेल के नेतृत्व और वी. पी. मेनन के योगदान ने इस प्रक्रिया को दिशा प्रदान की। इसीलिए पटेल को आधुनिक भारत के राजनीतिक एकीकरण के प्रमुख शिल्पकारों में स्थान दिया जाता है।

पटेल की ऐतिहासिक उपलब्धि का महत्त्व इस तथ्य में निहित है कि उन्होंने स्वतंत्रता को एक संगठित और स्थिर राष्ट्र के निर्माण से जोड़ा। उनके प्रयासों ने आधुनिक भारतीय गणराज्य की क्षेत्रीय अखंडता और प्रशासनिक एकता की नींव मजबूत की।

सरदार पटेल की विरासत का स्मरण करते हुए आज हमारे सामने एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है—क्या राजनीतिक एकीकरण ही राष्ट्रीय एकता की पूर्णता है? निश्चय ही नहीं। राजनीतिक अखंडता राष्ट्र की आवश्यक शर्त है, लेकिन स्थायी राष्ट्रीय एकता के लिए सामाजिक न्याय, समान अवसर, पारस्परिक सम्मान और नागरिकों के बीच विश्वास भी अनिवार्य हैं।

भारत की एकता का अर्थ भाषाई, धार्मिक और सांस्कृतिक विविधताओं को समाप्त करना नहीं है। इसकी वास्तविक शक्ति विविधताओं के सम्मानपूर्ण सह-अस्तित्व में निहित है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना में न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के आदर्श इसी राष्ट्रीय दृष्टि को अभिव्यक्त करते हैं।

संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता सुनिश्चित करता है। अनुच्छेद 15 धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग और जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है। अनुच्छेद 19 नागरिकों को विभिन्न स्वतंत्रताएँ प्रदान करता है, जबकि अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता और अनुच्छेद 29-30 सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक अधिकारों की रक्षा करते हैं। इन संवैधानिक प्रावधानों का व्यापक संदेश है कि भारतीय राष्ट्र की एकता नागरिकों की समान गरिमा और अधिकारों पर आधारित होनी चाहिए। लोकतंत्र में विचारों का मतभेद स्वाभाविक है। वास्तविक चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि मतभेद सामाजिक शत्रुता और विभाजन का कारण न बनें।

राजनीतिक प्रतिस्पर्धा लोकतंत्र का स्वाभाविक अंग है, लेकिन जब राजनीतिक मतभेद विभिन्न समुदायों के बीच अविश्वास और स्थायी दूरी उत्पन्न करने लगें, तब राष्ट्रीय सद्भाव कमजोर होता है। राष्ट्रीय एकता तभी टिकाऊ होगी, जब प्रत्येक नागरिक को यह विश्वास हो कि उसके अधिकारों और गरिमा की संवैधानिक रूप से रक्षा की जाएगी।

राष्ट्रीय एकता के निर्माण में शिक्षा की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना या परीक्षा उत्तीर्ण करना नहीं, बल्कि विवेकशील, संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक तैयार करना भी है।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन इसका उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद, डॉ. भीमराव आंबेडकर और नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे नेताओं के विचारों तथा राजनीतिक दृष्टिकोणों में अंतर था, फिर भी स्वतंत्रता और राष्ट्रनिर्माण की व्यापक ऐतिहासिक प्रक्रिया में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। यह अनुभव बताता है कि राष्ट्रीय एकता के लिए विचारों की समानता अनिवार्य नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक सह-अस्तित्व और साझा राष्ट्रीय उद्देश्यों के प्रति प्रतिबद्धता आवश्यक है।

महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों का दायित्व है कि वे विद्यार्थियों में आलोचनात्मक चिंतन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, संवाद की संस्कृति और संवैधानिक मूल्यों के प्रति सम्मान विकसित करें। राष्ट्रीय सेवा योजना, राष्ट्रीय कैडेट कोर, सामुदायिक सेवा, पर्यावरण संरक्षण तथा सामाजिक जागरूकता के कार्यक्रम युवाओं में सहयोग, अनुशासन और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित कर सकते हैं।

उच्च शिक्षण संस्थानों में ऐसा वातावरण होना चाहिए, जहाँ किसी भी आधार पर विद्यार्थी के साथ भेदभाव न हो। ग्रामीण क्षेत्र के विद्यार्थियों, आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के युवाओं और छात्राओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तथा समान अवसर उपलब्ध कराना भी राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम है। राष्ट्रीय एकता को समझने के लिए संविधान के अनुच्छेद 51A में उल्लिखित मौलिक कर्तव्यों पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है। 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 के माध्यम से मौलिक कर्तव्यों को संविधान में शामिल किया गया था। अनुच्छेद 51A(ग) प्रत्येक नागरिक को भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा का दायित्व सौंपता है। वहीं अनुच्छेद 51A(ङ) धार्मिक, भाषाई, क्षेत्रीय और वर्गीय विविधताओं से ऊपर उठकर सद्भाव तथा भाईचारे की भावना विकसित करने की अपेक्षा करता है। अनुच्छेद 51A(च) हमारी समन्वित सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर बल देता है। इस प्रकार संविधान राष्ट्रीय एकता को केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं मानता, बल्कि इसे प्रत्येक नागरिक के आचरण और सामाजिक व्यवहार से जोड़ता है।

सरदार वल्लभभाई पटेल ने स्वतंत्रता के बाद देशी रियासतों के एकीकरण के माध्यम से आधुनिक भारत की राजनीतिक अखंडता को मजबूत करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। आज उनकी विरासत से प्रेरणा लेते हुए हमें राष्ट्रीय एकता को सामाजिक न्याय, समान नागरिकता, संवैधानिक निष्ठा और मानवीय संवेदनशीलता के व्यापक संदर्भ में समझना होगा राजनीतिक एकीकरण ने भारत को एक संगठित राष्ट्र के रूप में स्थापित किया, लेकिन सामाजिक एकता का निर्माण निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। इसकी सफलता इस बात से निर्धारित होगी कि देश का प्रत्येक नागरिक समान अधिकारों, अवसरों और सम्मान के साथ राष्ट्र की विकास यात्रा में भागीदार बन सके।

राष्ट्रीय एकता दिवस का वास्तविक संदेश यही है कि भारत की एकता केवल इतिहास में प्राप्त उपलब्धि नहीं, बल्कि वर्तमान में निभाई जाने वाली जिम्मेदारी और भविष्य के लिए किया जाने वाला संकल्प है।

भारत की शक्ति उसकी विविधता में है, उसकी स्थिरता संवैधानिक मूल्यों में और उसकी वास्तविक एकता नागरिकों के पारस्परिक विश्वास में निहित है। सरदार पटेल ने जिस राजनीतिक एकीकरण की नींव रखी, उसे सामाजिक न्याय, समानता और बंधुत्व के माध्यम से मजबूत करना आज हमारी पीढ़ी का ऐतिहासिक दायित्व है।


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