विश्वविद्यालय संस्कृत विभाग, प्राचीन भारतीय इतिहास, पुरातत्त्व एवं संस्कृति विभाग तथा डॉ प्रभात दास फाउंडेशन द्वारा संगोष्ठी आयोजित

मिथिला का पुरातात्विक इतिहास काफी समृद्ध एवं उन्नत, जिन्हें संजोने एवं उनपर वैज्ञानिक शोध करने की जरूरत- डॉ फणिकान्त

मिथिला का पुरातात्विक इतिहास सभ्यता, दर्शन, कला एवं संस्कृति का जीवन्त प्रमाण, जिनका संरक्षण एवं वैज्ञानिक अनुसंधान हम सबका दायित्व- डॉ चौरसिया

दरभंगा :_ वाल्मीकि रामायण के अनुसार राजा निमि ने एक राजवंश की नींव रखी और उनके पुत्र मिथि के नाम पर इस क्षेत्र का नाम ‘मिथिला’ पड़ा तथा यहाँ के शासक ‘जनक’ कहलाए। राजा जनक के काल में मिथिला वैदिक दर्शन, न्याय और तर्कशास्त्र का प्रमुख केन्द्र रहा। जहां बालिराजगढ़, राजनगर, जनकपुर, उच्चैठ, शांतिगढ़, उग्रतारा, सिंगोर, जलालगढ़ आदि अनेक महत्त्वपूर्ण पुरातात्त्विक स्थल हैं। उक्त बातें ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के स्नातकोत्तर संस्कृत विभाग एवं प्राचीन भारतीय इतिहास, पुरातत्त्व एवं संस्कृति विभाग तथा डॉ प्रभात दास फाउंडेशन, दरभंगा के संयुक्त तत्त्वावधान में “मिथिला का पुरातात्विक इतिहास” विषय पर पीजी संस्कृत विभाग में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी को मुख्य अतिथि रूप में संबोधित करते हुए आर्कियोलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया, पूर्वी जोन, कोलकता के पूर्व क्षेत्रीय निदेशक एवं पुरातत्त्ववेत्ता डॉ फणिकान्त मिश्र ने कही। उन्होंने कहा कि मिथिला का पुरातात्त्विक इतिहास प्राचीन वैदिक संस्कृति, मौर्य, शुंग, कुषाण और गुप्त कालों से लेकर मध्यकाल तक की निरंतरता को दर्शाता है। मिथिला क्षेत्र में पुरातत्त्व सर्वे आफ इंडिया का केन्द्र खुलना चाहिए, ताकि यहां के पुरातत्त्व संबंधी सारे काम सुचारू रूप से चल सके। मिथिला का पुरातात्विक इतिहास काफी समृद्ध एवं उन्नत है, जिसे संजोकर उसपर वैज्ञानिक शोध करने की जरूरत है।


मुख्य अतिथि के रूप में मानविकी संकायाध्यक्ष प्रो पुनीता झा ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि मेरा माइनर/मेजर प्रोजेक्ट पुरातत्त्व से संबंधित है, जिसे मैं शीघ्र ही प्रकाशित कर आऊंगी। उन्होंने कहा कि मिथिला क्षेत्र के सभी पुराने गढ़ों एवं मंदिरों आदि की समुचित देखरेख होनी चाहिए। प्राचीन भारतीय इतिहास, पुरातत्त्व एवं संस्कृति विभाग के अध्यक्ष डॉ अमिर अली खान ने उद्घाटन संबोधन में कहा कि पुरातत्त्व मिथिला की प्राचीन पहचान को दर्शाता है, जिस पर योजनाबद्ध एवं संगठित रूप से काम करने की जरूरत है। कहा कि यदि नई पीढ़ी के शोधार्थियों इसपर काम करें तो मिथिला को नए ढंग से समझने में मदद विशेष मिलेगी।
अतिथि स्वागत एवं विषय प्रवेश करते हुए संगोष्ठी के संयोजक डॉ आर एन चौरसिया ने कहा कि मिथिला का पुरातात्विक इतिहास हमारी सभ्यता, ज्ञान-परंपरा और सांस्कृतिक निरंतर को दर्शाता है। मिथिला का पुरातात्विक इतिहास सभ्यता, दर्शन, कला एवं संस्कृति का जीवन्त प्रमाण है। कहा कि वैज्ञानिक पुरातात्विक प्रमाणों एवं साहित्यिक स्रोतों के समुचित अध्ययन से प्राचीन मिथिला को और अधिक प्रामाणिक रूप में प्रस्तुत करना संभव है। मिथिला की पुरातात्विक विरासत का संरक्षण और वैज्ञानिक अनुसंधान हम सबका एक महत्त्वपूर्ण दायित्व है।
अध्यक्षीय संबोधन में संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ कृष्णकान्त झा ने विभाग की ओर से इस सफल आयोजन के लिए सभी व्यक्तियों को बधाई एवं धन्यवाद देते हुए कहा कि मिथिला में पुरातात्विक स्रोत के रूप में अभिलेख, मुद्रा, पांडुलिपि, मृदभांड एवं साहित्यिक प्रमाण आदि प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं, जिन्हें प्रकाश में लाने की आवश्यकता है। कार्यक्रम का प्रारंभ शिवानी एवं कुमकुम के मंगलाचरण पाठ से हुआ, जबकि अतिथियों ने दीप प्रज्वलन कर संगोष्ठी का उद्घाटन किया। अतिथियों का स्वागत पाग, चादर एवं पुष्प-पौधों से किया गया। संगोष्ठी में भाग लेने वाले शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों को फाउंडेशन की ओर से प्रमाण पत्र प्रदान किया गया। कुमकुम कुमारी के संचालन में आयोजित कार्यक्रम में फाउंडेशन के सचिव मुकेश कुमार झा ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

Mr.M.H. Khan
Author: Mr.M.H. Khan


Leave a Comment

और पढ़ें