कोजगरा: चाँदनी, समृद्धि और संबंधों में रची-बसी मिथिला की सांस्कृतिक विरासत

दरभंगा, (डॉ. संजय कुमार सहनी)_मिथिला की सांस्कृतिक पहचान उसके भव्य धार्मिक अनुष्ठानों से ही नहीं, बल्कि उन लोकपरंपराओं से भी निर्मित हुई है, जिनमें परिवार, समाज, प्रकृति और मानवीय संबंध एक-दूसरे से गहराई से जुड़े दिखाई देते हैं। कोजगरा ऐसा ही एक पर्व है। शरद ऋतु की चांदनी पूर्णिमा, चंद्रमा की शीतल चाँदनी, मखाने की सफेदी, पान की सुगंध, पारिवारिक सौगातों की आत्मीयता और नवविवाहित वर के सम्मान से मिलकर बना यह उत्सव मिथिला की सामूहिक सांस्कृतिक स्मृति का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। इसकी विशिष्टता यह है कि एक व्यापक धार्मिक परंपरा को मिथिला ने विवाहोत्तर सामाजिक संस्कार का ऐसा स्वरूप दिया, जिसमें दो परिवारों का संबंध धीरे-धीरे पूरे समाज की सहभागिता में बदल जाता है।

कोजगरा की वास्तविक महत्ता समझने के लिए इसे केवल लक्ष्मी-पूजा अथवा नवविवाहित दूल्हे के सम्मान तक सीमित करके देखना पर्याप्त नहीं है। यह पर्व समृद्धि की कामना के साथ संबंधों के निर्वाह, सामाजिक प्रतिष्ठा, पारिवारिक उत्तरदायित्व और सांस्कृतिक निरंतरता की भी अभिव्यक्ति है। इसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पक्ष का अध्ययन हमें यह समझने में मदद करता है कि लोकपरंपराएँ किस प्रकार धार्मिक विश्वासों को सामाजिक जीवन का अंग बना लेती हैं।

कोजगरा का संबंध आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से है। यही तिथि शरद पूर्णिमा के नाम से भी जानी जाती है। संस्कृत के ‘को जागर्ति’ अर्थात् ‘कौन जाग रहा है?’ से कोजागर या कोजागरा नाम की व्युत्पत्ति जोड़ी जाती है। पारंपरिक धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस रात माता लक्ष्मी पृथ्वी पर विचरण करती हैं और जागरण करने वाले भक्तों को समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करती हैं। संस्कृत के पारंपरिक कोशों में भी ‘कोजागर’ का उल्लेख आश्विन की पूर्णिमा पर मनाए जाने वाले उत्सव के रूप में मिलता है। इस प्रकार, इस नाम और पर्व का संबंध केवल आधुनिक लोकप्रचलन से नहीं, बल्कि पुरानी संस्कृत शब्दकोशीय परंपरा से भी प्रमाणित होता है।

धार्मिक परंपराओं में शरद पूर्णिमा का संबंध लक्ष्मी-पूजा, रात्रि-जागरण और विभिन्न प्रकार के पारंपरिक खेलों से रहा है। कुछ वैष्णव मान्यताओं में इस तिथि को भगवान कृष्ण की रासलीला से भी जोड़ा जाता है। किंतु इन मान्यताओं को समझते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि विभिन्न क्षेत्रों में शरद पूर्णिमा के धार्मिक आख्यान और अनुष्ठान एक जैसे नहीं हैं। मिथिला में इसी व्यापक पर्व ने नवविवाहित वर के प्रथम कोजगरा का विशिष्ट रूप धारण किया है।

कोजगरा शरद पूर्णिमा की व्यापक धार्मिक परंपरा और मिथिला की विवाह-संबंधी लोकरीतियों के दीर्घकालीन समन्वय से इस पर्व का वर्तमान विशिष्ट स्वरूप विकसित हुआ। इसकी ऐतिहासिकता का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष स्वयं इसकी निरंतरता है—पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती परंपराएँ, पारिवारिक व्यवहार और सामाजिक स्मृतियाँ।

भारत के अनेक क्षेत्रों में शरद पूर्णिमा धार्मिक आस्था और रात्रि-जागरण का अवसर है, लेकिन मिथिला में कोजगरा का एक विशिष्ट सामाजिक अर्थ भी है। विवाह के बाद नवविवाहित वर के घर में पहला कोजगरा विशेष उत्साह से मनाया जाता है। इस अवसर पर वधू पक्ष की ओर से वर के घर ‘भार’ भेजने की परंपरा है। यह भार केवल उपहारों का संग्रह नहीं, बल्कि नवविवाहित संबंध को औपचारिक आत्मीयता प्रदान करने वाला सांस्कृतिक माध्यम है।

भार में पान, मखाना, मिठाइयाँ, फल, वस्त्र, नारियल, धान, दही तथा अन्य पारंपरिक सामग्रियाँ शामिल हो सकती हैं। परिवार और आर्थिक स्थिति के अनुसार इसकी सामग्री मिलती है। कहीं बाँस के बड़े डाले को विशेष ढंग से सजाया जाता है, तो कहीं वस्त्र, छाता, छड़ी, चाँदी की कौड़ी और अन्य पारंपरिक वस्तुएँ भी रखी जाती हैं। इस विविधता को किसी एक अपरिवर्तनीय नियम के बजाय मिथिला की जीवंत लोकसंस्कृति का हिस्सा समझना चाहिए।

भार की सबसे बड़ी विशेषता उसका भावनात्मक अर्थ है। विवाह के समय दो परिवारों के बीच स्थापित संबंध को यह पर्व आगे बढ़ाता है। वधू पक्ष की ओर से भेजी गई सौगात वर के परिवार के प्रति सम्मान, सद्भाव और अपनत्व का संदेश देती है। इसके प्रत्युत्तर में वर पक्ष भी इस संबंध को सामाजिक रूप से स्वीकार और प्रतिष्ठित करता है। इस प्रकार, कोजगरा विवाह को केवल दो व्यक्तियों का निजी संबंध न रहने देकर दो परिवारों और उनके सामाजिक परिवेश के बीच स्थायी संवाद का अवसर बनाता है।

जब भार (उपहार) स्नेह, आशीर्वाद और सहभागिता का माध्यम होता है, तब वह संस्कृति को समृद्ध करता है; लेकिन यदि उसे प्रतिष्ठा की प्रतिस्पर्धा, महँगे उपहारों अथवा आर्थिक दबाव से जोड़ दिया जाए, तो वही परंपरा अपने मूल उद्देश्य से दूर हो सकती है।

कोजगरा की प्रमुख रस्मों में वर का ‘चुमाओन’ विशेष महत्त्व रखता है। पारंपरिक विधि में वर को ससुराल से आए डाले की सामग्री के साथ शुभकामनाएँ और आशीर्वाद दिए जाते हैं। दूर्वा, अक्षत, धान तथा अन्य मंगलकारी सामग्रियों का उपयोग स्थानीय रीति के अनुसार किया जाता है। महिलाओं की सहभागिता, पारंपरिक गीतों और मंगलाचरण से यह आयोजन पारिवारिक उत्सव का रूप ग्रहण करता है।

चुमाओन को केवल एक धार्मिक क्रिया के रूप में देखना इसके सामाजिक अर्थ को सीमित कर देना होगा। यह नवविवाहित वर के नए पारिवारिक दायित्वों की सार्वजनिक स्वीकृति का भी प्रतीक है। परिवार और समाज उसके नए जीवन के लिए शुभकामना व्यक्त करते हैं। विवाह के बाद रिश्तों की जो नई संरचना बनती है, चुमाओन उसे आत्मीयता और सामाजिक मान्यता प्रदान करता है।

फिर भी इस परंपरा की समकालीन व्याख्या में दूल्हे के सम्मान के साथ दुल्हन की गरिमा, इच्छा और समान भागीदारी को भी केंद्रीय स्थान मिलना चाहिए। विवाह दो व्यक्तियों का संबंध है। अतः कोजगरा की सांस्कृतिक चेतना तभी अधिक सामाजिक होगी, जब उत्सव में दोनों की खुशियों, सम्मान और भविष्य के प्रति समान संवेदनशीलता दिखाई दे।

मिथिला की पहचान में मखाना का स्थान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। जलाशयों और तालाबों से जुड़ी इसकी खेती, व्यापार और उपभोग क्षेत्र की आजीविका तथा खाद्य-संस्कृति के अनेक पक्षों से संबंधित हैं। कोजगरा में मखाने का विशेष महत्त्व इस पर्व को स्थानीय प्रकृति और अर्थव्यवस्था से जोड़ता है। पान, मिठाई, फल, वस्त्र और अन्य सामग्री भी इस उत्सव के बाजार को सक्रिय करती हैं।

भार की तैयारी के समय परिवारों द्वारा की जाने वाली खरीदारी से स्थानीय दुकानदारों, मिठाई बनाने वालों, वस्त्र विक्रेताओं और पारंपरिक सामग्री उपलब्ध कराने वाले लोगों को आर्थिक गतिविधि का अवसर मिलता है। इसलिए कोजगरा का अध्ययन केवल धार्मिक अनुष्ठान के रूप में नहीं, बल्कि लोक-अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक उपभोग की दृष्टि से भी किया जा सकता है।

मखाना और पान का वितरण इस पर्व को निजी उपभोग से सामुदायिक सहभागिता की ओर ले जाता है। ससुराल से आए उपहार परिवार के भीतर ही सीमित नहीं रहते,उन्हें पड़ोसियों, संबंधियों और समाज के लोगों के बीच बाँटा जाता है। इस प्रक्रिया में सौगात का अर्थ बदल जाता है—वह किसी एक व्यक्ति की संपत्ति न रहकर सामूहिक आनंद का माध्यम बनती है।

यहाँ एक व्यापक सांस्कृतिक संदेश भी छिपा है। प्रकृति से प्राप्त संसाधनों का सम्मान तभी सार्थक है, जब उनके संरक्षण और उत्पादन से जुड़े लोगों की आजीविका भी सुरक्षित हो। जिस मखाने को कोजगरा में शुभता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, उसके पीछे जलाशयों, श्रम और स्थानीय ज्ञान की एक पूरी दुनिया है। अतः इस पर्व की सांस्कृतिक रक्षा में तालाबों और पारंपरिक जलस्रोतों का संरक्षण भी अप्रत्यक्ष रूप से महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

कोजगरा की एक अन्य आकर्षक परंपरा कौड़ी तथा अन्य पारंपरिक खेलों से जुड़ी है। कुछ परिवारों में चौपड़, पचीसी अथवा ताश जैसे खेल भी खेले जाते हैं। इनका स्वरूप हर जगह एक जैसा नहीं होता, लेकिन इनके माध्यम से रात्रि-जागरण, पारिवारिक संवाद और सामूहिक मनोरंजन का वातावरण बनता है।

धार्मिक मान्यता में लक्ष्मी-पूजा और जागरण का संबंध समृद्धि से है। दूसरी ओर, खेल इस उत्सव को सहजता, हँसी और आपसी मेलजोल प्रदान करते हैं। इस प्रकार धार्मिक आस्था और मनोरंजन एक ही आयोजन में साथ दिखाई देते हैं। इसे आधुनिक जीवन की उस आवश्यकता से भी जोड़ा जा सकता है, जिसमें परिवार के सदस्यों को व्यस्त दिनचर्या से निकलकर एक-दूसरे के साथ समय बिताने का अवसर मिलता है।

हालाँकि पारंपरिक खेलों को आर्थिक दाँव, जुए या अनावश्यक प्रतिस्पर्धा का रूप देना इस सांस्कृतिक उद्देश्य के अनुकूल नहीं होगा। उत्सव का मूल भाव आनंद, सहभागिता और मंगलकामना है, न कि आर्थिक जोखिम।

शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की चाँदनी को भारतीय लोकजीवन में विशेष महत्त्व दिया गया है। प्रचलित मान्यता है कि इस रात चंद्रकिरणों में अमृततुल्य गुण होते हैं। इसी विश्वास से अनेक क्षेत्रों में खीर या दूध को चाँदनी में रखने और बाद में प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की परंपरा जुड़ी है। मिथिला में भी मखाना, खीर और अन्य पारंपरिक खाद्य पदार्थ इस पर्व की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा हैं।

इतिहास और संस्कृति का विवेकपूर्ण अध्ययन लोकविश्वासों का सम्मान करते हुए उनकी प्रकृति को स्पष्ट करता है। चंद्रकिरणों से अमृत बरसने की धारणा धार्मिक आस्था और लोककल्पना का हिस्सा है; इसे आधुनिक विज्ञान द्वारा प्रमाणित शाब्दिक तथ्य नहीं माना जाना चाहिए। इसी प्रकार, खुले में रखे भोजन को ग्रहण करते समय स्वच्छता और खाद्य-सुरक्षा का ध्यान रखना आवश्यक है।

इस विश्वास का सांस्कृतिक महत्त्व फिर भी कम नहीं होता। चंद्रमा, दूध, खीर और सामूहिक प्रसाद के माध्यम से प्रकृति के साथ मनुष्य के भावनात्मक संबंध की अभिव्यक्ति होती है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि प्रकृति केवल संसाधनों का भंडार नहीं, बल्कि मानवीय कल्पना, आस्था और उत्सवों की भी आधारभूमि है।

कोजगरा की परंपराएँ परिवार की महिलाओं, बुजुर्गों और लोकगीतों के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही हैं। भार की तैयारी, मंगलगीत, चुमाओन की विधि, पारंपरिक वस्तुओं का चयन और अतिथियों का स्वागत—इन सबमें घरेलू ज्ञान तथा सांस्कृतिक स्मृति की महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है।

लोकसंस्कृति के इतिहास में यह पक्ष विशेष ध्यान देने योग्य है। अनेक परंपराएँ लिखित ग्रंथों से अधिक मौखिक स्मृतियों, व्यवहारों और पारिवारिक अनुष्ठानों के माध्यम से सुरक्षित रहती हैं। कोजगरा भी इसी प्रक्रिया का उदाहरण है। इसके विविध रूपों को समझने के लिए स्थानीय बुजुर्गों की स्मृतियाँ, मैथिली लोकगीत, परिवारों में प्रचलित अनुष्ठान, क्षेत्रीय विवरण और पुराने समाचार-पत्र उपयोगी स्रोत हो सकते हैं।

इस सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने के लिए केवल उत्सव मनाना पर्याप्त नहीं है। इसकी विविध विधियों, गीतों, शब्दावली और पारिवारिक अनुभवों का दस्तावेजीकरण भी आवश्यक है। महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में स्थानीय इतिहास तथा लोकसंस्कृति के अध्ययन के अंतर्गत ऐसी परंपराओं पर मौखिक इतिहास परियोजनाएँ चलाई जा सकती हैं। इससे नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत समझने का अवसर मिलेगा और भविष्य के शोधकर्ताओं के लिए विश्वसनीय सामग्री भी उपलब्ध होगी।

आज शिक्षा, रोजगार और प्रवासन के कारण मिथिला के अनेक परिवार देश के विभिन्न शहरों और विदेशों में रहते हैं। इसके बावजूद कोजगरा जैसे पर्व पारिवारिक और सांस्कृतिक संबंधों को जीवित रखने का अवसर प्रदान करते हैं। घर लौटना, संबंधियों से मिलना, पारंपरिक सामग्री खरीदना और सामूहिक आयोजन में भाग लेना लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ता है।

लेकिन बदलते समय में इस पर्व के सामने कुछ चुनौतियाँ भी हैं। उपहारों का बढ़ता खर्च, आर्थिक हैसियत के आधार पर प्रतिष्ठा का प्रदर्शन, दिखावे की प्रतिस्पर्धा और अनुष्ठानों का केवल औपचारिक आयोजन बन जाना इसकी आत्मीयता को प्रभावित कर सकते हैं। यदि भार को आर्थिक बोझ बना दिया जाए, तो वह संबंधों में मिठास भरने के बजाय तनाव का कारण बन सकता है।

इसलिए परंपरा का संरक्षण केवल उसके बाहरी स्वरूप को बनाए रखने में नहीं, बल्कि उसके मानवीय मूल्यों को सुरक्षित रखने में है। सादगीपूर्ण भार, पारस्परिक सम्मान, दोनों परिवारों की सहज भागीदारी, महिलाओं की गरिमा और सामूहिक प्रसाद-वितरण को प्राथमिकता देकर इस पर्व को अधिक समावेशी बनाया जा सकता है।

इसी तरह, पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी भी इसके आधुनिक स्वरूप का हिस्सा बननी चाहिए। स्थानीय उत्पादों को प्रोत्साहन देना, जलाशयों की रक्षा करना, भोजन की बर्बादी रोकना और अनावश्यक खर्च से बचना कोजगरा के समृद्धि-संदेश को व्यवहार में उतारने के व्यावहारिक उपाय हैं।

कोजगरा मिथिला की ऐसी सांस्कृतिक परंपरा है, जिसमें शरद पूर्णिमा की धार्मिक आस्था, लक्ष्मी-पूजा की मंगलकामना, मखाना और पान की स्थानीय पहचान, भार की पारिवारिक आत्मीयता, चुमाओन का आशीर्वाद तथा सामुदायिक उल्लास एक साथ दिखाई देते हैं। इसकी ऐतिहासिकता को किसी अप्रमाणित प्राचीन दावे से जोड़ने के बजाय धार्मिक परंपराओं और लोकजीवन के दीर्घकालीन सहअस्तित्व के रूप में समझना अधिक उचित है।

इस पर्व का सबसे महत्त्वपूर्ण संदेश यह है कि समृद्धि केवल धन, उपहार और प्रतिष्ठा का नाम नहीं है। परिवारों के बीच विश्वास, रिश्तों में सहजता, समाज में सहभागिता, स्त्रियों का सम्मान, स्थानीय आजीविका की सुरक्षा और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता भी समृद्ध जीवन के आवश्यक आधार हैं।

मिथिला की सांस्कृतिक विरासत तभी जीवंत रहेगी, जब उसकी परंपराएँ नई पीढ़ी तक केवल रस्मों के रूप में नहीं, बल्कि उनके पीछे छिपे मानवीय मूल्यों के साथ पहुँचेंगी। कोजगरा की चाँदनी में इसलिए केवल लक्ष्मी के आगमन की कामना ही नहीं, बल्कि ऐसे समाज का स्वप्न भी देखा जा सकता है, जहाँ संबंधों में आत्मीयता हो, समृद्धि में साझेदारी हो और परंपरा में समानता तथा संवेदना का स्थान हो।
कोजगरा की असली रोशनी चंद्रमा की चाँदनी में ही नहीं, बल्कि उन संबंधों में है जिन्हें यह पर्व स्नेह, सम्मान और साझी खुशियों से प्रकाशित करता है।


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