धर्म की दीवारों से ऊपर उठकर श्रम, समता और इंसानियत का भारत बनाने का संदेश

दरभंगा, 26 अक्टूबर,भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में गणेश शंकर विद्यार्थी का व्यक्तित्व निर्भीक पत्रकारिता, सामाजिक न्याय और सांप्रदायिक सद्भाव का प्रेरणास्रोत है। वे उन स्वतंत्रता सेनानियों में थे, जिन्होंने विदेशी शासन के विरुद्ध संघर्ष को केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे शोषण, सामाजिक विषमता और सांप्रदायिक विभाजन के विरुद्ध व्यापक अभियान का स्वरूप दिया। उनकी जयंती पर उन्हें याद करना उस मानवीय आदर्श को पुनर्जीवित करना है, जिसमें धर्म से ऊपर इंसानियत, स्वार्थ से ऊपर सामाजिक न्याय और विभाजन से ऊपर एकता को स्थान मिलता है।
26 अक्टूबर 1890 को जन्मे गणेश शंकर विद्यार्थी ने 9 नवंबर 1913 को कानपुर से हिंदी साप्ताहिक प्रताप का प्रकाशन आरंभ किया। उन्होंने अपनी पत्रकारिता को अंग्रेजी शासन के दमन, किसानों के शोषण और मजदूरों की समस्याओं के विरुद्ध जनजागरण का माध्यम बनाया। उनके लिए पत्रकारिता सत्ता की प्रशंसा का साधन नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने और समाज के कमजोर वर्गों को अभिव्यक्ति देने का दायित्व थी। आज जब पत्रकारिता की स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी पर बहस होती है, तब विद्यार्थी जी का जीवन सत्यनिष्ठ और जनपक्षधर पत्रकारिता की याद दिलाता है।
विद्यार्थी जी के व्यक्तित्व का सबसे उज्ज्वल पक्ष हिंदू-मुस्लिम एकता और सांप्रदायिक सद्भाव के प्रति उनकी प्रतिबद्धता थी। वे समझते थे कि धर्म के नाम पर समाज का विभाजन राष्ट्रीय एकता को कमजोर करता है और जनता को उसकी साझा समस्याओं से दूर ले जाता है। उनके लिए भारत सभी धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों के लोगों का साझा देश था। वे धार्मिक विविधता को संघर्ष का कारण नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन की स्वाभाविक विशेषता मानते थे।
उनकी दृष्टि में सांप्रदायिक सद्भाव केवल नैतिक उपदेश नहीं, बल्कि स्वतंत्रता और लोकतंत्र की बुनियादी आवश्यकता थी। जिस समाज में लोग धर्म के नाम पर एक-दूसरे के शत्रु बन जाएं, वहां अन्याय और शोषण के विरुद्ध सामूहिक संघर्ष कमजोर पड़ जाता है। इसलिए उन्होंने अपने लेखन और सार्वजनिक जीवन के माध्यम से विभाजनकारी प्रवृत्तियों का विरोध किया। उनका संदेश था कि किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान से अधिक महत्त्वपूर्ण उसका मानवीय अस्तित्व और उसके अधिकार हैं।
विद्यार्थी जी की विचारधारा की सर्वोच्च अभिव्यक्ति 25 मार्च 1931 को कानपुर में हुई उनकी शहादत में दिखाई देती है। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 23 मार्च 1931 को फांसी दिए जाने के बाद कानपुर में सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी। शहर में भय और अविश्वास का वातावरण था। ऐसे समय में विद्यार्थी जी अपनी सुरक्षा की चिंता किए बिना हिंसा प्रभावित क्षेत्रों में लोगों की जान बचाने के लिए निकल पड़े। इसी दौरान भीड़ की हिंसा में उनकी हत्या कर दी गई।
उनका बलिदान इस बात का प्रमाण है कि सांप्रदायिक सद्भाव उनके लिए केवल लेखनी का विषय नहीं, बल्कि जीवन का संकल्प था। उन्होंने किसी एक समुदाय के लिए नहीं, बल्कि मानवता की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर किए। उनकी शहादत आज भी यह प्रश्न उठाती है कि क्या हम धर्म के नाम पर होने वाली हिंसा के विरुद्ध उसी साहस से खड़े होते हैं, जिसकी मिसाल विद्यार्थी जी ने प्रस्तुत की थी?
आज जब अफवाहों, धार्मिक कट्टरता और सामाजिक अविश्वास से सद्भाव को चुनौती मिलती है, तब उनका संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। समाज में स्थायी शांति केवल अपीलों से नहीं, बल्कि परस्पर सम्मान, संवाद, न्याय और सभी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने से स्थापित होती है। धर्म के नाम पर नफरत फैलाने के बजाय आपसी विश्वास मजबूत करना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।
गणेश शंकर विद्यार्थी के चिंतन का दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष किसानों और मजदूरों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता थी। औपनिवेशिक काल में कानपुर उत्तर भारत का प्रमुख औद्योगिक केंद्र बन चुका था। सूती मिलों और अन्य उद्योगों में काम करने वाले मजदूरों को कम मजदूरी, लंबे कार्यकाल और कठिन परिस्थितियों जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता था। विद्यार्थी जी ने इन प्रश्नों को अपनी पत्रकारिता में स्थान देकर श्रमिकों के अधिकारों और मानवीय गरिमा के पक्ष में आवाज उठाई।
उनके विचारों की वर्तमान प्रासंगिकता मजदूर एकता के प्रश्न पर विशेष रूप से दिखाई देती है। कारखानों, निर्माण स्थलों और अन्य कार्यक्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिकों के धर्म, जाति और भाषा अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन उचित मजदूरी, सुरक्षित कार्यस्थल, रोजगार की स्थिरता और सम्मानजनक जीवन की उनकी आकांक्षाएं समान होती हैं। इन साझा हितों की रक्षा का सबसे प्रभावी आधार आपसी सहयोग और संगठन है।
धार्मिक विभाजन मजदूरों की सामूहिक शक्ति को कमजोर कर सकता है। जब श्रमिक धर्म और जाति के आधार पर एक-दूसरे से अलग होते हैं, तब उनके साझा आर्थिक और सामाजिक प्रश्न पीछे छूट जाते हैं। इसके विपरीत, जब वे अपने अधिकारों के लिए एकजुट होते हैं, तब शोषण के विरुद्ध उनकी आवाज अधिक प्रभावशाली बनती है। इसीलिए सांप्रदायिक सद्भाव और मजदूर एकता को अलग-अलग विषयों के रूप में नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण समाज के निर्माण से जुड़े परस्पर पूरक मूल्यों के रूप में देखना चाहिए।
वास्तविक मजदूर एकता का अर्थ जाति, धर्म और लिंग के आधार पर होने वाले भेदभाव की अनदेखी करना भी नहीं है। इसका अर्थ है कि सभी श्रमिकों को समान अधिकार, सम्मान और अवसर प्राप्त हों तथा किसी की सामाजिक पहचान उसके अधिकारों में बाधा न बने। विद्यार्थी जी की जनपक्षधर दृष्टि हमें यही प्रेरणा देती है कि समाज को बांटने वाली शक्तियों के बजाय श्रम, समानता और मानवीय गरिमा को प्राथमिकता दी जाए।
गणेश शंकर विद्यार्थी का जीवन बताता है कि स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि शोषण और अन्याय से मुक्त समाज की स्थापना भी है। उनकी पत्रकारिता ने किसानों और मजदूरों की समस्याओं को सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनाया तथा उनके बलिदान ने सांप्रदायिक सद्भाव को सर्वोच्च नैतिक मूल्य के रूप में स्थापित किया।
आज पत्रकारों, शिक्षकों, श्रमिक संगठनों और नागरिक समाज की जिम्मेदारी है कि वे सामाजिक एकता, स्वतंत्र विचार और आर्थिक न्याय के मूल्यों को मजबूत करें। शिक्षण संस्थानों में नई पीढ़ी को विद्यार्थी जी के जीवन से परिचित कराना आवश्यक है, ताकि वह समझ सके कि राष्ट्र निर्माण केवल राजनीतिक उपलब्धियों से नहीं, बल्कि नागरिकों के बीच विश्वास, समानता और सहयोग से होता है।
गणेश शंकर विद्यार्थी को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि धर्म के नाम पर नफरत की दीवारें खड़ी करने के बजाय सद्भाव के पुल बनाए जाएं, मजदूरों को धार्मिक पहचान के आधार पर बांटने के बजाय उनके अधिकारों के लिए एकजुट किया जाए और पत्रकारिता को समाज के कमजोर वर्गों की आवाज बनाया जाए। उनका जीवन हमें सिखाता है कि राष्ट्र की वास्तविक शक्ति सांप्रदायिक वर्चस्व में नहीं, बल्कि मानवीय एकता, श्रम के सम्मान और सामाजिक न्याय में निहित है।
Author: Sanjay Kumar Sahni










