प्रतियोगिता में कुमकुम, मुस्कान, रूपेश एवं दयानंद ने पाया टॉप 3 में स्थान, प्रमाण पत्र एवं मोमेंटो से किया गया हौसला-अफजाई


दरभंगा :_ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा के स्नातकोत्तर संस्कृत विभाग के द्वारा श्रावणी पूर्णिमा के अवसर पर विभाग में संस्कृत दिवस समारोह का आयोजन किया गया। विभागाध्यक्ष डॉ कृष्णकान्त झा की अध्यक्षता में आयोजित कार्यक्रम में पूर्व पीजी संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रो हृषिकेश झा-मुख्य अतिथि, कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व व्याकरण विभागाध्यक्ष प्रो दयानंद झा-सारस्वत अतिथि, विभागीय प्राध्यापक डॉ आर एन चौरसिया- स्वागत कर्ता एवं विषय प्रवेशक के रूप में संबोधित किया। दीप प्रज्वलन से समारोह प्रारंभ हुआ। मंगलाचरण कुमकुम कुमारी ने प्रस्तुत किया। कार्यक्रम का संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन जिग्नेश कुमार ने किया। अतिथियों का स्वागत पाग, चादर एवं मोमेंटो से किया गया। इस अवसर पर रितु कुमारी, मुस्कान कुमारी, शंकर कुमार, रूपेश कुमार, ज्योति कुमारी, खुशबू कुमारी, श्वेता शिवानी, कुमकुम कुमारी, जिग्नेश कुमार, दयानंद कुमार, उदय कुमार उदेश, मंजू अकेला एवं योगेन्द्र पासवान आदि ने सक्रिय योगदान किया। समारोह में संस्कृत भाषा में निबंध प्रतियोगिता एवं भाषण प्रतियोगिता आयोजित किये गये। भाषण प्रतियोगिता में कुमकुम कुमारी-प्रथम, मुस्कान कुमारी-द्वितीय एवं रूपेश कुमार ने तृतीय स्थान प्राप्त किया, जबकि निबंध प्रतियोगिता में कुमकुम कुमारी-प्रथम, रूपेश कुमार- द्वितीय एवं दयानंद ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। दोनों प्रतियोगिताओं में क्रमशः शंकर कुमार एवं खुशबू कुमारी को सांत्वना पुरस्कार प्रदान किया गया। सभी सफल प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र एवं मोमेंटो प्रदान कर हौसला-अफजाई किया गया।

डॉ कृष्णकान्त झा ने संस्कृत भाषा एवं साहित्य और संस्कृत दिवस के इतिहास एवं महत्व को विस्तार से रेखांकित करते हुए बताया कि संस्कृत सम्पूर्ण विश्व की सर्वाधिक प्राचीन, समृद्ध एवं मधुर भाषा है। इसका व्याकरण वैज्ञानिक एवं कंप्यूटर के लिए सर्वाधिक उपयोगी है। उन्होंने बताया कि केन्द्र सरकार के मंत्री कर्ण सिंह के प्रयास से श्रावणी पूर्णिमा के दिन सत्रारंभ दिवस के रूप में 1969 से संस्कृत दिवस मनाया जा रहा है। प्रो हृषिकेश झा ने कहा कि संस्कृत ज्ञान का आधुनिक समय में काफी प्रासंगिकता है। इंटरनेट एवं कंप्यूटर आदि के माध्यम से संस्कृत का अधिक से अधिक प्रचार-प्रसार किया जा सकता है। प्रो दयानाथ झा ने कहा कि प्राचीन काल में संस्कृत लोकभाषा के रूप में प्रसिद्ध थी। इसमें संस्कार और संस्कृति विद्यमान है। यह परिष्कृत एवं शुद्ध भाषा है।
डॉ आर एन चौरसिया ने कहा कि संस्कृत ज्ञान-विज्ञान समृद्ध एक पवित्र भाषा है, जिसे भारत की आत्मा कहा जाता है। यह हमारी सांस्कृतिक परंपरा एवं मानवीय मूल्य की आधारशिला है। कहा कि यह केवल पूजा-पाठ या मंत्र की भाषा नहीं, बल्कि ज्ञान-विज्ञान, तर्कशास्त्र का अक्षय भी स्रोत है।
Author: Darpan 24 News










